Saturday, October 18, 2008

काश ! शिव का विलाप काम आ जाए

काश ! शिव का विलाप काम आ जाए
शिव विलाप कर रहे हैं। यह शिव, शिव चोपड़ा हैं। एनआरआई हैं। 50 साल पहले पढ़ लिखकर भाग गए थे कनाडा। माइक्रोबाइलोजी के विशेषज्ञ हैं। बड़ी - बड़ी दवा कंपनियों में काम किया। कनाडा सरकार को भी हिलाया। स्वीकार रहे हैं कि अपने घर (देश) में भ्रष्टाचार के कारण भागे थे। वैज्ञानिक महोदय साफ सुथरे तरीके से काम करना चाहते थे। बन कर रह गए थे मल्टीनेशनल कंपनियों के हाथ की कठपुतली। जब - जब विरोध किया, मुंह की खानी पड़ी। ज्यादा चालबाजी दिखाई तो कनाडा की संसद ने कानून को ही बदल डाला। जुबान पर ताला लगा दिया। अमेरिकी और यूरोपीय कंपनियों में वही सबकुछ हुआ, जिसके लिए भारत छोड़ा था। अब बूढ़े हो गए हैं तो मुंह उठाए फिर भारत ही लौट आए हैं। बता रहे हैं कि किस तरह कीटनाशक दवाओं से लेकर बीमारियों से लड़ने के लिए टीकों तक का कारोबार होता है। वैक्सिन के नाम पर कितना बड़ा बाजार है। कैसे इनकी वजह से हर आदमी को कैंसर का खतरा हो गया है। देश - विदेश के नेताओं को भी कोस रहे हैं और वैज्ञानिकों को भी। समझा रहे हैं कि पैसों के पीछे किस तरह सभी की नैतिकता बौनी पड़ जाती है। कभी अमृतसर के गुरु नानक देव विश्वविद्यालय में सेमिनार कर रहे हैं तो कभी गरीबों की सेवा में लगी संस्था पिंगलवाड़ा में खड़े होकर देश के पिंगलवाड़ा बन जाने का खतरा बता रहे हैं। कभी गुजरात के अहमदाबाद में जाकर नरेंद्र मोदी को लताड़ रहे हैं। कांग्रेसी हों या भाजपाई, सभी शिव चोपड़ा के निशाने पर हैं। कामरेडों पर भी गुनाह मढ़ने में देरी नहीं कर रहे। तर्कों में दम है। जमीन से जुड़ी बातें कर रहे हैं। गांधी को याद करते हुए दांडी मार्च, नमक सत्याग्रह और अंग्रेजों के भारत से भाग जाने का इतिहास दुहरा रहे हैं। बात बोरिंग हैं परंतु एक तो एनआरआई और ऊपर से पीएचडी विद्वान, देशी विद्वानों की मानों चीर कर हाथ में आ जा रही है। कोई कैसे सवाल उठाए, बाबा शिव 50 साल जो कनाडा में गुजारे तब क्यों नहीं समझ आई। क्या डर नहीं लगना चाहिए। सतर्क नहीं हो जाना चाहिए कि शिव जैसे नामों पर देश के कोने - कोने में भटकने वाले मल्टीनेशनलों के ही एजेंटों की भी कमी नहीं है। कभी एड्स के नाम पर सीरिंज का कारोबार तो कभी हेपेटाइटीस के नाम पर टीके। चेचक के टीके। और अंत में सारा फेल। नया खेल। नया टीका। और तब कंपनियों के बुद्धिजीवी इंप्लांट किए जाते हैं देखने के लिए कि भारत का बाजार कैसा है ? सड़ा - गला माल बेचने की कितनी संभावनाएं हैं ? कहीं विद्रोह तो नहीं हो जाएगा ? शिव की बातों पर कोई सवाल नहीं है। उद्देश्य पर सवाल है। बुद्धि का उपयोग कौन करने जा रहा है ? अभी तक तो शिव चोपड़ा का इस्तेमाल कनाडा, अमेरिका और यूरोप की कंपनियों ने किया। शूट , बूट और टाई वाले शिव , इस देश को न छेड़ो। अभी यह सो रहा है। बेहतर हो यह खुद ही जाग जाए। अपने मिट्टी के प्रति वफादार लोगों द्वारा ही जगा दिया जाए। पूंजीवादी और साम्यवादी के संघर्ष में भारत का असली स्वरूप की खतरे में है। इस देश को जगना होगा। लेकिन जगाने वाला पश्चिम रिटर्न नहीं चाहिए। वैसे कोई एजराज भी नहीं अगर इस शिव का विलाप ही काम आ जाए।

6 comments:

सतीश पंचम said...

शिव विलाप काम आ जाय ऐसी हार्दिक कामना है।

Shastri said...

हिन्दी चिट्ठाजगत में इस नये चिट्ठे का एवं चिट्ठाकार का हार्दिक स्वागत है.

मेरी कामना है कि यह नया कदम जो आपने उठाया है वह एक बहुत दीर्घ, सफल, एवं आसमान को छूने वाली यात्रा निकले. यह भी मेरी कामना है कि आपके चिट्ठे द्वारा बहुत लोगों को प्रोत्साहन एवं प्रेरणा मिल सके.

हिन्दी चिट्ठाजगत एक स्नेही परिवार है एवं आपको चिट्ठाकारी में किसी भी तरह की मदद की जरूरत पडे तो बहुत से लोग आपकी मदद के लिये तत्पर मिलेंगे.

शुभाशिष !

-- शास्त्री (www.Sarathi.info)

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

यहाँ आकर आपलोगों ने अच्छा किया। स्वागत है।

शिव का विलाप जरूर सुना जाना चाहिए। शराब पीकर कोई बर्बाद हो जाय और दूसरे को इसे पीने से मना करे तो क्या आप इस आधार पर उसकी बात गलत मान लेंगे कि उसने खुद ही पी है तो दूसरों को नसीहत देने का उसे कोई हक नहीं?


बेहतर तो यह है कि उसके बुरे उदाहरण से एक अच्छी सीख ली जाय।

Udan Tashtari said...

हिन्दी चिट्ठाजगत में आपका स्वागत है. नियमित लेखन के लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाऐं.

संगीता पुरी said...

नए चिट्ठे के साथ आपका स्वागत है........आशा करती हूं कि आप अपनी प्रतिभा से हिन्दी चिट्ठाजगत को मजबूती देंगे........ बहुत बहुत धन्यवाद।

shama said...

Swagat hai...bohot, bohot dhanyawaad ke aisa lekh likha..!Kaash desh chod bhagnewalen ye padhen...!Mubarak ho!!
Meree filhaal chal rahee shrinkhala,"Ek Baar Phir Duvidha", isee vishayke chhidte shuru huee...apnaa desh chhod gaye ek atyant priy wyakteene Bharatpe teeka karnee aur apne sanskar chhod gharwalonse badtameezee karnee shuru kar dee...mujhse saha nahee gaya aur mai apne pathkonse ek prashn kar baithee...jawabme kuchh aur prashn aaye. Mai us wyakteekee mansiktaa aisee kyon banee is chakkarme gehraayeese tatolne lagee....pariwaarke saathkaa bartaav mujhe uske bachpanme le gaya...aur ye shrinkhala shuru huee..
Mere blogpe aaneka shehil nimantran!