<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-3049490265168027919</id><updated>2012-01-29T19:52:48.514-08:00</updated><category term='जलियांवाला बाग के शहीदों के बहाने'/><title type='text'>जागो इंडिया जागो</title><subtitle type='html'>(an unorganised peoples movement)</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://jaago--india--jaago.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3049490265168027919/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jaago--india--jaago.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>जागो--इंडिया--जागो</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03601506380058079689</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>20</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3049490265168027919.post-6139692693413548621</id><published>2010-09-25T22:32:00.000-07:00</published><updated>2010-09-25T22:32:30.574-07:00</updated><title type='text'>सिर के बल खड़ी व्यवस्था</title><content type='html'>कोई भी व्यवस्था बाशिंदों के आम हितों का पोषण और संरक्षण करने के उद्देश्य से ही स्थापित होती है। चाहे वह जंगल का कानून हो या सभ्य मानव समाज का। अगर इन बातों में दम है तो वर्तमान भारतीय व्यवस्था पर भी गौर करना पड़ेगा। सब कुछ सिर के बल नजर आने लगेगा। अपवादों को छोड़ दिया जाए तो टॉप पर वह बैठे हैं, जिन्हें कभी गली के चौराहों पर ही जगह मिलती थी। बचपन में इलाके और मोहल्ले के बुजुर्ग जिन बच्चों को पढ़ने - लिखने वाला, समझदार, बुद्धिमान, ईमानदार कहते थे, आज सत्ता के बाजार वाली व्यवस्था में उनकी कहीं पूछ नहीं। जिन्होंने मारपीट की, लफंगा घोषित कर दिए गए, कोई नौकरी नहीं मिली, बदली परिस्थितियों में मालिक बन गए। प्रतिभावानों में भी सिर्फ वही टॉप पर पहुंचने के काबिल बन पाए जिन्होंने मक्कारी या चापलूसी में से एक को अपना लिया। दिमाग पहले से तेज था ही, पहले किंगमेकर की भूमिका निभाई और फिर किंग बन गए। सत्ता के शीर्ष पर पहुंच गए।&lt;br /&gt;बातें कुछ अटपटी सी हैं। सीधे समझ भी नहीं आती। लेकिन यही हकीकत है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में अगल बगल झांकने पर सबकुछ साफ हो जाता है। जो नहीं पढ़ सके, नेता बन सरकार चला रहे हैं। दूसरी तरफ डाक्टर और इंजीनियर हैं। यह या तो अमेरिका, यूरोप और जापान भाग रहे हैं या फिर मैनेजर बनने की जुगाड़ में लगे हैं।&lt;br /&gt;तभी तो बाबा आदम के जमाने के दूसरा भगवान कहा जाने वाला डाक्टर और वैद्य अपने बच्चों को इस पेशे में नहीं ला रहा। पुरानी अवधारणा तेजी से बदल रही है। कार्पोरेट कल्चर के साथ नए भगवान उभरे हैं। नाम मिला है मैनेजर और काम मिला है विशेषज्ञों की विशेषज्ञता ( एक्सपर्ट आफ एक्सपर्टीज) का। पिछली सदी के अस्सी व नब्बे के दशक में डाक्टरी और इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद टेक्नोक्रेटों में विदेश भाग जाने या फिर आईएएस \ आईपीएस (भारतीय प्रशासनिक सेवाओं) बन जाने की होड़ लगी थी। अब उन्हीं इंजीनियरों - डाक्टरों के साथ-साथ आईएएस \ आईपीएस भी एमबीए की डिग्री लेकर कार्पोरेट का हिस्सा बन रहे हैं। यही है काल चक्र। लेकिन सत्य वहीं खड़ा है। सृष्टिकर्ता, पालनकर्ता और संहारकर्ता के हाथों में जीवन में धुरी है। ब्रह्मा, विष्णु और महेश के नए अवतार मैनेजर्स हैं जिनकी पलकों के झपकने से पूरी धरती हिलने लगती है। सामानों की कीमतें बढ़ और घट जाती हैं। गरीबी और भुखमरी पर चर्चा कभी आउट डेटेड विषय हो जाते हैं तो कभी जीवंत। समझने - समझाने की ज्यादा जरूरत नहीं कि लोकतंत्र के नए मालिक कौन हैं। सरकार उसी की बनेगी जिसे भगवान के नव अवतार चाहेंगे। सरकारी सेहत व्यवस्था बिना दवाई और डाक्टर की ओर बढ़ गई है। किसी को भी यह सोचकर भयभीत होने की छूट दी जा सकती है कि वह सोचे कि तब क्या होगा जब डाक्टर सिर्फ कार्पोरेट अस्पतालों में होंगे।&lt;br /&gt;इनमें दो राय नहीं कि काल के चक्र में कर्म की प्रतिष्ठा भी उपर-नीचे घूमती है। सामाजिक ताने-बाने को गणित के आंकड़ों के साथ समझ पाना कभी आसान भी नहीं रहा। भारतीय सामाजिक व्यवस्था में कभी श्रेष्ठ जन माने जाने वाले पंडितों की प्रतिष्ठा कुछ ऐसी ही थी। इन्हीं में से कोई वेदों का ज्ञाता था तो कोई वैद्य था। इनके दर्शन और ज्ञान के भंडार का पूरा समाज सम्मान करता था। संभव है एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक ज्ञान भंडार सिमट जाने के कारण `पंडित ' शब्द की प्रतिष्ठा गिर गई हो। यह बातें ब्रह्मज्ञानी रहे ब्राह्मण परिवारों की `समाजवादी' दृष्टि वाली नई पीढ़ी से भी सुनी जा सकती है। वह भी अपनी जाति पर समाज के अन्य वर्गों व जातियों के साथ अत्याचार करने के आरोप कई-कई उदाहरणों के साथ लगाते हैं।&lt;br /&gt;समाज की चिंता का मुख्य विषय किसी वर्ग विशेष या जाति विशेष के हितों की रक्षा होना या नहीं होना, नहीं हो सकता। प्रतिभाओं का संरक्षक नहीं हो पाना और उनका भटकाव समाज के लिए चुनौतीपूर्ण मुद्दा जरूर होना चाहिए। खूंखार अपराधियों के दिमागी परीक्षण में भी यह खुलासे हुए हैं कि उनकी प्रतिभा का समाज हित में उपयोग काफी लाभदायक सिद्ध हो सकता था। सभ्य समाज में कोई व्यवस्था, चाहे वह लोकतांत्रिक हो या राजशाही, आदर्श उद्देश्य प्रतिभा का सम्मान ही होना चाहिए। वर्तमान दौर कर्म की प्रतिष्ठा परिवर्तन का दौर बना है। कुछ जगहों पर नजर भी आ रहा है कि कार्पोरेट की नई उभरती दुनिया में वही श्रेष्ठ है जिसकी तरफ पैसा पानी की तरह बहता हो। इस कड़ी में यह कहना थोड़ा तल्ख होगा कि जो बिना जबावदेही के प्रतिमाह लाखों से करोड़ों की आमदनी की ओर बढ़ गया, वही सर्वश्रेष्ठ हैं। शेयर बाजार घुलटनिया खा जाए (लुढ़क जाए) तो बड़े खिलाड़ियों का कोई दोष नहीं। वह इतना कमा चुके होते हैं कि विश्व के धनाड्यों में ही शामिल रहेंगे। गुनाह तो उन छोटे निवेशकों, दुकानदारों, कारोबारियों और उद्यमियों का है, जो लालची बन गए। सही कहें तो लालची बना दिया गया। उद्योग - कारोबार बंद कर पैसे शेयर में लगा दिए। अब कर्जदार बन गए हैं।&lt;br /&gt;अब मूल मुद्दे पर चर्चा जरा विस्तार से। दो से ढाई दशक पहले तक दसवीं की परीक्षा पास करने के बाद जिन विद्यार्थियों को मेडिकल (जीव विज्ञान) और नान मेडिकल (गणित) की पढ़ाई का मौका नहीं मिलता था, सामान्यत: वही कामर्स से प्लस टू करते थे। आमतौर पर जो विद्यार्थी ज्यादा कमजोर होते थे, वही आट्रर्स की पढ़ाई करते थे। माता-पिता अपने प्रतिभावान बच्चों को डाक्टर और इंजीनियर ही बनाना चाहते थे। सालों बाद भी मेडिकल कालेजों की संख्या में बहुत इजाफा नहीं हो सका है। सेहत सुविधाओं को हर आदमी तक पहुंचाने के लिए डाक्टरों की संख्या आज भी कम है। इंजीनियरिंग कालेजों की संख्या अपेक्षाकृत तेजी से बढ़ी है। कंप्यूटर और कम्युनिकेशन सहित अन्य नए रास्ते भी विस्तारित हुए हैं। लेकिन वक्त, चाहत और प्राथमिकताएं बदल चुकी हैं। सिर्फ समाज के लिए जीना अब किसी सिद्धांत में नहीं आता। अब तो समाज सेवा भी पेशा है। एनजीओ बनाओ, खूब कमाओ।&lt;br /&gt;बात को दशक पहले तक प्रतिभा के आधार पर पेशे की तरफ केंद्रित किया जाए तो विज्ञान के विद्यार्थियों को समाज में प्रतिभावान माना जाता था। प्लस टू या हायर सेकेंडरी में मेडिकल और नान मेडिकल छात्रों की संख्या लगभग बराबर होती थी। लेकिन डाक्टरी की सीटें कई गुना कम होने के आधार पर कहा जा सकता है कि समाज का सबसे प्रतिभाशाली हिस्सा सरकारी मेडिकल कालेजों से डाक्टर या फिर आईआईटी जैसी प्रतिष्ठा संस्थाओं से इंजीनियर बनकर पेशेवर जीवन की शुरूआत करता था। तीसरे स्थान पर उन प्रतिभाओं को रखा जा सकता है जो उच्च शिक्षा और शोध ( रिसर्च) का लक्षय कर पढ़ाई आगे बढ़ाते और सफलता पाते हैं। प्लस टू के बाद देश व प्रदेश स्तर पर आयोजित होने वाले एनडीए (नैशनल डिफेंस एकेडमी) या घर की स्थिति अच्छी न होने के कारण प्रतियोगिता परीक्षाओं में शामिल हो अन्य सरकारी नौकरियों में चुने जाते थे। इन्हीं के साथ प्रतिभा के चौथे स्थान पर मजबूर पारिवारिक आर्थिक स्थिति वाली प्रतिभाओं को सम्मान दिया जा सकता है जिन्होंने कारोबार को विस्तार दिया। औद्योगिक क्रांति में अहम भूमिका निभाई। इसके बाद राष्ट्रीय व प्रादेशिक प्रशासनिक सेवाओं की बारी आती है। इसमें चयनित होने वाली प्रतिभाओं में ट्रिक्स का खेल काफी दिनों चलता रहा जिसमें संस्कृत, पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन या समाज शास्त्र जैसे विषय लेकर कार्यपालिका की शीर्ष व्यवस्था तैयार होती रही। डाक्टरों और इंजीनियरिंगों को भी इस बात का अहसास हुआ कि उनके हुकमरान प्रतिभा के मामले में किस स्तर पर हैं। देश की श्रेष्ठ मेडिकल व इंजीनियरिंग प्रतिभाओं ने लगातार कई कई सालों तक यूपीएससी ( यूनियन पब्लिक सर्विस कमिशन) की परीक्षाओं में टॉप पोजिशनें हासिल कर इस तथ्य को स्थापित किया तथा कार्यपालिका पर कब्जा करते रहे। अपवादों को छोड़ प्रतिभा व्यवस्था में सामान्य रूप से छठे स्थान पर वह हैं जिनकी प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी करते-करते उम्र निकलने लगी। लॉ कालेज में दाखिला ले लिया। कानून की पढ़ाई पूरी कर न्यायपालिका के प्रतिनिधि बन गए। इसके आगे कानून के वह माहिर विद्यार्थी रहे जो दिल्ली के चांदनी चौक, लखनऊ के हजरतगंज और पटना के गांधी मैदान के आसपास के चौक चौराहों से फुर्सत नहीं निकाल सके। चाकू गाढ़कर डिग्री हासिल की और नेता बन गए। नजरें जरा गौर से घुमाने की जरूरत है। ऐसी कई हस्तियां उभर कर सामने आ जाती हैं। यह है लोकतांत्रिक भारत के सिरमौर विधायिका के प्रतिनिधि।&lt;br /&gt;यह स्पष्ट करने की जरूरत नहीं कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में विधायिका सर्वश्रेष्ठ है। विधायिका कानून बनाती हैं और न्यायपालिक उसके आधार पर फैसले सुनाती है। कार्यपालिका उसका पालन करती है। जैसे एक बार संसंद से यह कानून पास हो जाए कि विरासत केंद्रों (हेरिटेज सेंटरों) से 100 गज की दूरी के अंदर कोई निमार्ण नहीं कराया जा सकता, तो आर्कोलॉजिक सर्वे आफ इंडिया (एएसआई) उसका पालन करेगी। इससे आगरा में ताजमहल के आसपास के निमार्ण वैध हो गए। भले ही उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती को पिछली बार सत्ता में रहते हुए उक्त अनुमति देने के लिए कानूनी कठघरे में खड़ा किया हो। यही है मैनेजमेंट! लंबी सोच । दूर दष्टि। अब प्राइवेट पार्टियों और प्रोपटी डीलरों के सामने पुलिस क्या कर लेगी? यह काम कोई डाक्टर या इंजीनियरिंग तो कर ही नहीं सकता। यह तो पीपीपी का एक नया फार्मूला है जिसमें एक और पी जुड़ गया है। यह पब्लिक - प्राइवेट पार्टिसिपेशन का उभरता समीकरण है। देश के हर कोने में लोकल स्तर की राजनीति में परिवर्तन है। पार्षद और विधायक बनकर कानून को संचालित करने - कराने में जमीन - जायदीद खरीदने और बेचने का धंधा करने वालों ( प्रोपर्टी डीलरों) की बढ़ती संख्या पर नजर डालने की जरूरत है। कार्पोरेट और माल कल्चर में लोकतंत्र की बदलती तस्वीर सामने आने लगती है। कई बार लोकतंत्र पूंजी का खेल लगने लगता है। समाज का, समाज के लिए और समाज के द्वारा का सिद्धांत कहीं छूट गया है। अब तो कार्पोरेट मैनेजर ही युवा लक्ष्य है। वह कार्पोरेट, जिसके हाथ में किसी देश की सत्ता पर सरकारों को कबिज कराने और हटाने की चाबी है। सुपर पावर अमेरिकी का भी तो यही राज है, जहां सिर्फ कानून - व्यवस्था संभालना ही सरकार का काम बच गया है। बाकी सबकुछ कार्पोरेट जगत के हाथ में है। भारतीय परिदृश्य में नए परिवर्तन भी कुछ ऐसे ही संदेश देने लगे हैं। इस सभी परिवर्तनों के बीच प्रतिभा के पेशागत पलायन से जुड़े प्रतिमानों पर चिंतन करने की जरूरत है। डाक्टर बनकर गरीबों के इलाज की सोचना तथा इंजीनियर बनकर देश की उर्जा समस्या का समाधान नई पीढ़ी की चुनौती नहीं है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3049490265168027919-6139692693413548621?l=jaago--india--jaago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jaago--india--jaago.blogspot.com/feeds/6139692693413548621/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3049490265168027919&amp;postID=6139692693413548621' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3049490265168027919/posts/default/6139692693413548621'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3049490265168027919/posts/default/6139692693413548621'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jaago--india--jaago.blogspot.com/2010/09/blog-post.html' title='सिर के बल खड़ी व्यवस्था'/><author><name>जागो--इंडिया--जागो</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03601506380058079689</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3049490265168027919.post-7041282254957918872</id><published>2010-02-10T08:59:00.000-08:00</published><updated>2010-02-10T09:00:15.388-08:00</updated><title type='text'>शहीदों के खानदान ही खत्म!</title><content type='html'>शहीदों के खानदान ही खत्म!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ढूंढे़ नहीं मिल रहे जलियांवाला बाग में मारे गए लोगों के परिजन। शर्म! शर्म!! शर्म!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सतीश चंद्र श्रीवास्तव&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देश को आजादी की प्रेरणा देने वाले जलियांवाला बाग के शहीदों के खानदान ही खत्म हो गए हैं। आजादी के 62 साल बाद इस दुर्गति पर न तो संसद में एक बार भी आवाज उठी है और न ही अब तक आर्डर! आर्डर!! आर्डर!!! वाला कोई वाकया ही सामने आया है। जाहिर है जिन लोगों ने स्वतंत्रता आंदोलन में जान गंवाई, उनके खानदान में ही कोई नामलेवा नहीं बचा। ऐसे में उन शहीदों की आवाज कौन उठाए? वर्तमान समय में इस मुद्दे को उठाने की प्रासंगिकता पर भी सवाल खड़े होते हैं। लोग पूछते हैं, गडे़ मुर्दे क्यों उखाड़ते हो? लेकिन मामला मौजूं हो गया है। केंद्र सरकार ने एक साल पहले शहीदों को स्वतंत्रता सेनानी मान तो लिया था, परंतु अब तक उनकी आधिकारिक सूची तक तैयार नहीं हो सकी है। मारे गए हजारों लोगों में से सिर्फ 16 लोगों के वारिसों का पता लगाया जा सका है। घटना के 90 साल और आजादी के 62 साल बाद यह शहीदों के प्रति उदासीनता क्या कम शर्मनाक है! कहते हैं, जो कौम अपने शहीदों का सम्मान नहीं करती, उसका विनाश हो जाता है। विश्व के हर कोने में इसके उदाहरण भरे पड़े हैं। ऐसे में समझ लेने की जरूरत है ही कि देश के नेता भारत के किस भविष्य का निर्माण कर रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;14 दिसंबर 2008 को केंद्र सरकार ने जलियांवाला बाग कांड, 1919 के शहीदों को स्वतंत्रता सेनानियों की सूची में शामिल करने का आधिकारिक आदेश जारी किया था। देश के सभी अखबारों और चैनलों पर प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और अंबिका सोनी की तस्वीरों से युक्त विज्ञापन प्रकाशित और प्रसारित किया गया। अब एक साल बाद सिर्फ 16 शहीदों के परिजनों का पता लगा पाना क्या कौम के खात्मे का गंभीर संकेत नहीं दे रहा? क्या पूंजीवाद और भूमंडलीकरण के दौर में राष्ट्रीयता और राष्ट्रभक्ति जैसी बातें अप्रासंगिक और दकियानूसी नहीं हो गई हैं? परंतु इस बात का जवाब भी तो सोचना पड़ेगा कि राष्ट्रीय हितों की उपेक्षा करके अमेरिका-इंग्लैंड ही नहीं, चीन और जापान भी कोई कदम क्यों नहीं नहीं उठाते? ऐसे में भारतीय व्यवस्था आखिर किनके हाथों में खेल रही है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सवालों में इतिहासकार&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतिहास के पन्नों में सभी ने पढ़ा है कि 13 अप्रैल 1919 को 'वैशाखी वाले दिन' जनरल डॉयर के नेतृत्व में ब्रिटिश फौज ने अमृतसर के जलियांवाला बाग में निहत्थे लोगों पर अंधाधुंध फायरिंग की थी। हजारों की संख्या में लोग मारे गए थे। इतिहासकारों के पास इस बात का जवाब नहीं है कि किसे भ्रम में डालने के लिए और किसकी चापलूसी करते हुए पुस्तकों में 'वैशाखी वाले दिन' का इस्तेमाल किया गया। हकीकत यह है कि अमृतसर में वैशाखी मेला की कोई परंपरा नहीं है। पंजाब में वैशाखी का मेला आनंदपुर साहिब में लगता है। जलियांवाला बाग में न पहले कभी मेला लगता था और न आज ही कोई परंपरागत आयोजन होता है। कड़वी सचाई यह भी है कि आज के अमृतसर में पांच प्रतिशत लोग भी नहीं जानते कि मजदूर और मानवाधिकारों के विरोधी रॉलेट एक्ट के खिलाफ 31 मार्च और 6 अप्रैल को पूर्ण बंदी तथा 9 अप्रैल को रामनवमी के जुलूस में हिंदू-मुस्लिम एकता ने अंग्रेजों को हिला कर रख दिया था। आंदोलन प्रभावित करने के लिए 10 अप्रैल 1919 को प्रमुख नेता डा. सैफुद्दीन किचलू और डा. सत्यपाल को गिरफ्तार किया गया तो युवा हिंसक हो उठे। अंग्रेजों पर हमला बोला। स्टेशन, बैंक, डाकघर को निशाना बनाया। देशभक्तों पर हुई फायरिंग में 35 शहीद हुए। 13 अप्रैल को इसी सिलसिले में शोकसभा थी, जिसमें 20 हजार से अधिक लोग मौजूद थे। मदन मोहन मालवीय के नेतृत्व में सेवा समिति के दल ने 1500 से अधिक शहीदों की सूची तैयार की थी। उक्त सूची अब गायब है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंग्रेजों के रिकार्ड और गजट के अनुसार 464 देशभक्त शहीद हुए थे। अमृतसर जिला प्रशासन और जलियांवाला बाग कमेटी ने 501 शहीदों की सूची तैयार की है। इनमें से सिर्फ 16 शहीदों के परिजनों का पता लगाया जा सका है। इनमें से 13 नाम जलियांवाला बाग शहीद परिवार समिति के अध्यक्ष भूषण बहल ने दिए हैं। सरकार सिर्फ तीन शहीद परिवारों को ही खोज सकी है। शहीदों की उपेक्षा की पोल खुलने के डर से पिछले एक साल से परिजनों को स्वतंत्रता सेनानी परिवार के रूप में स्वीकृति पत्र देने की प्रक्रिया तक शुरू नहीं की जा सकी है। हकीकत यह भी है कि जलियांवाला बाग में फायरिंग के बाद लगभग छह महीने तक गांवों के लोगों को भी अमृतसर आने-जाने नहीं दिया गया। सबूतों को खत्म करने का प्रयास किया गया। 13 अप्रैल की घटना को एक सप्ताह तक दबाए रखने की कोशिश हुई। जब देशवासियों को दर्दनाक कारनामों की जानकारी मिली तो पूरा देश जल उठा। कवियों ने जलियांवाला बाग को केंद्र में रखकर गीत लिखे। गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने सर की ब्रिटिश उपाधि लौटा दी। इस घटना के बाद ही महात्मा गांधी राष्ट्रीय नेता के रूप में उभरे। उन्हें अमृतसर पहुंचने के पहले ही गिरफ्तार कर लिया गया था। दूसरी तरफ सत्ता से जुड़े लोगों ने मामले को रफा दफा करने की हर संभव कोशिश की। पीडि़तों को बिना देरी मुआवजा दिया गया, ताकि विरोध के स्वर कम हों। इसके साथ ही भ्रम फैलाने का दौर शुरू हो गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विभाजन का दर्द&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सत्ता पर काबिज होने के लिए कुर्बानियों को कैसे कुर्बान किया जाता है, यह कोई जलियांवाला बाग की मिट्टी से पूछे। आजादी के आंदोलन में हिंदू-मुस्लिम एकता प्रतीक के रूप में उभरे अमृतसरवासियों को देश विभाजन ने सांप्रदायिक हिंसा में झोंक दिया। 9 अप्रैल 1919 को जिस अमृतसर के लोगों ने डा. हफीज मुहम्मद बशीर के नेतृत्व में रामनवमी का जुलूस निकाला था, वहीं के लोगों ने एक दूसरे का खून किया। विभाजन के दौरान 10 लाख लोग मारे गए। अमृतसर का स्वरूप ही बदल गया। मुस्लिम बहुल अमृतसर में बड़ी संख्या में हिंदू और सिख आबादी लाहौर और पेशावर से पलायन कर आ बसी। इधर जिन लोगों के परिजनों ने बाद में वतन के लिए शहादत दी थी, वे जैसे तैसे जिंदा बचे तो, पराया वतन के हो गए। पाकिस्तानी बना दिए गए। ऐसे में कोई क्यों लेगा जलियांवाला बाग के शहीदों की सुध। उनका खानदान या तो सांप्रदायिक खून-खराबे में खत्म हो गया या पलायन कर गया। जो बच गए, वह खौफ खाते हैं कि गलती से उनके देशभक्त परिवार से संबंधित होने का राज न खुल जाए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शहीद हरिराम बल के पौत्र भूषण बहल 1980 से जलियांवाला बाग केशहीदों को स्वतंत्रता सेनानी घोषित किए जाने के लिए संघर्ष कर रहे थे। अब वह 60 वर्ष के हो चुके हैं। उनके साथी 90 वर्षीय सोहनलाल भारती का परिवार अमृतसर में फाकाकशी के बाद दिल्ली में दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष कर रहा है। बाग कांड के समय सोहनलाल अपनी मां अमृतकौर के गर्भ में थे। इसी वीरांगना मां ने सुहाग लूटने वालों से मुआवजा लेने से इंकार कर दिया था। इसी तरह अमृतसर के चौक पासियां में 65 साल की उम्र में भी टेलीफोन बूथ चला कर गुजारा करने वाले नंदलाल अरोरा अपने शहीद दादा पर गर्व नहीं कर पाते। उन्हें पता है कि 1919 की घटना में अंग्रेजों का साथ देने वालों के पास आज गाड़ी-बंगले और उद्योग-धंधे हैं। वही लोग पैसे के बल पर अब नेता बन कर सरकार चला रहे हैं। इन सभी घटनाक्रमों पर जलियांवाला बाग का कण - कण गवाही दे रहा है, पर कोई सुनने को तैयार नहीं। आजादी के 62 साल बाद भी वहां शहीदों की सूची तक नहीं लग सकी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आजादी के बाद बाग&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जलियांवाला बाग को सुरक्षित रखने के नाम पर 1952 में संसद में ट्रस्ट बिल पास किया गया। पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू इसके अध्यक्ष बने। उस समय से ही सरकारी कब्जे में चल रहे बाग को अब तक राष्ट्रीय धरोहरों की सूची तक में शामिल नहीं किया जा सका है। संख्या का भ्रम बताकर शहीदों की सूची नहीं तैयार की जा रही। बुरी तरह घिरने केबाद 14 दिसंबर 2008 को भले ही सरकार ने बाग केशहीदों को स्वतंत्रता सेनानी घोषित कर दिया, पर अब तक एक भी परिवार को स्वतंत्रता सेनानी परिवार का दर्जा नहीं मिल सका है। सवाल दो स्तर पर है। ऐसी कृतघ्नता क्यों? इतनी देरी क्यों? इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि आजादी केबाद से ही जिस ट्रस्ट के अध्यक्ष देश के प्रधानमंत्री रहे हों, उसकी इस कदर उपेक्षा क्यों? प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह वर्ष 2007 से पदेन अध्यक्ष हैं, परंतु एक बार भी इस मसले पर मुंह नहीं खोल पाते तो संदेह और गहरा जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(प्रखर पत्रकार श्री सतीश मेरे मित्र हैं और पत्रकारिता के दौरान लगभग नौ साल उन्होंने अमृतसर में गुजारे हैं। जलियांवाला बाग के शहीदों को गति दिलाना उनका सपना है। देखें यह कब पूरे भारतवर्ष का सपना बनता है। यह सपना कब साकार होता है। -कौशल)&lt;br /&gt;Posted by Kaushal at 8:19 PM&lt;br /&gt;Reactions:   &lt;br /&gt;6 comments:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देवेन्द्र said...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    क्या कर रही है सरकार? उफ!&lt;br /&gt;    December 10, 2009 11:19 PM &lt;br /&gt;ranjan said...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    वाह सतीश भाई वाह, एक सच्चे भारतीय का फर्ज निभा रहे हैं आप। मनमोहन सिंह के पदेन अधिकारी होने के वावजूद यदि शहीदों के परिजन नहीं खोजे जा रहे हैं तो यह देश के लिए शर्मनाक है। शर्मनाक।&lt;br /&gt;    December 10, 2009 11:23 PM &lt;br /&gt;chandra said...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    यह पूरे देश के लिए सवाल है। इसका जवाब पूरे देशवासियों को मिलकर ढूंढ़ना होगा। सतीश भाई को सलाम कि सवाल उठाने का पुनीत काम उन्होंने किया है। वरना तो लोग अपने दरबे से निकलना आजकल छोड़ चुके हैं। सरकार और मंत्रियों तक का यही हाल है।&lt;br /&gt;    December 10, 2009 11:27 PM &lt;br /&gt;ब्रजेश said...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    इतिहास को वर्तमान में आपने जिस दिल-गुर्दे के साथ पेश किया है, उस हिम्मत को दाद देता हूं। रपटें तो बहुत पढ़ीं, पर ऐसी रपट पहली बार पढ़ी है। सच आपने पत्रकारिता धर्म को इस रपट से परिभाषित भी किया है। सवाल उठा है तो जवाब भी मिलेगा। सरकार नहीं तो कोई और सही, मगर मेरा भरोसा है कि शहीदों को सम्मान मिलेगा, उनके परिजनों को सम्मान मिलेगा। देश में अभी लज्जत बची हुई है।&lt;br /&gt;    December 10, 2009 11:33 PM &lt;br /&gt;Anonymous said...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    आपका यह अभियान अच्‍छा है लेकिन आज कल का नेता सिर्फ अपने स्‍वार्थ के लिए राजनीति करते हैं उनको देश व समाज से को मतलब नहीं है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    समाज सेवक&lt;br /&gt;    December 11, 2009 1:54 PM &lt;br /&gt;रविकांत प्रसाद said...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    इन्हें लाश की राजनीति में भी शर्म नहीं आती!&lt;br /&gt;    प्रसंग-एक : निठारी कांड का एक पात्र सुरेन्द्र कोली, जो छोटे-छोटे बच्चों को टुकड़ों में काटकर उसका गोश्त खाता था। फिलहाल जेल में हैं, कोली की चर्चा छिड़ते ही लोगों के चेहरे पर घृणा के भाव उभर आते हैं जबकि वह अपने जुर्म की सजा भुगत रहा है। कोली जैसे हत्यारे ने अपने जघन्य अपराध को माना।&lt;br /&gt;    प्रसंग-दो : दिल्ली में गए वर्ष हुए एक बम विस्फोट की जानकारी जब तत्कालीन गृह मंत्री को मिली तो उन्होंने पहले सूट बदला, पाउडर चपोड़े फिर देखने गए कि कितने लोग मारे गए हैं? गृह मंत्री ने मरे लोगों के शवों पर कत्थक करने से पहले खुद को सजा-संवार लिया था। इस घटना के कुछ ही माह बाद ये पद से हट गए, परंतु इन्हें कभी पछतावा नहीं हुआ।&lt;br /&gt;    प्रसंग-तीन : झारखंड राज्य बनने के पहले राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद बिहार के मुख्यमंत्री थे, इन्होंने एक भाषण में कहा था कि उनके शव पर ही राज्य का बंटवारा होगा। यानी जीते जी वे बंटवारे की बात को स्वीकार नहीं करेंगे। कुछ दिनों बाद झारखंड स्वतंत्र राज्य बना। लालू प्रसाद अब भी राजनीति कर रहे हैं। इन्हें कोई पछतावा नहीं कि झारखंड बनने से बिहार कमजोर हो गया।&lt;br /&gt;    सतीश श्रीवास्तव जी आपके लेख जलियांवाला बाग के खानदान ही खत्म! मैंने पढ़ा, आपको बधाई कि आपने एक ऐसे विषय को छुआ जिसे लाशों पर राजनीति करने वाले इतिहास का मरा पात्र भी मानने को तैयार नहीं हैं। आपके लेख से मस्तिष्क में 'आइला' उठा, उसे शांत करने के लिए उक्त प्रसंगों का सहारा लेना पड़ा। जिस देश के नेता को जलियांवाला बाग के शहीद को शहीद मानने में परेशानी हो रही है, इनके लिए कौन-सा शब्द इस्तेमाल किया जाए। इसपर पर गंभीरता से विचार करना होगा? हाल ही में मनसे नेताओं ने सपा विधायक अबू आजमी को हिन्दी में शपथ लेने के लिए प्रताडि़त किया था। मनसे नेताओं को शायद मां को मां कहने में भी शर्म आती है। ऐसे विचारधारा के नेता भला शहीद को शहीद आसानी से कैसे कहेंगे, कैसे मान लेंगे। जलियांवाला बाग की घटना तो भारतीय के मुंह पर अंग्रेजों का एक ऐसा तमाचा था जिससे भारतीय टूट जाए, झूक जाए। परंतु इसी घटना ने भारत में आजादी की ऐसी मशाल जलाई जिसमें अंग्रेज धू-धूकर जल गए। केन्द्र व राज्य सरकारों ने स्वतंत्रता सेनानियों को तो कई सुविधाएं दीं, क्योंकि ये जिंदा हैं, वोट दे सकते हैं, इन्हें गद्दी पर बिठा सकते हैं। परंतु 1919 में घटी जलियांवाला बाग की घटना के शहीदों को अबतक शहीद का दर्जा न मिलना वास्तव में चिंतनीय है। इसमें मारे गए शहीदों की गिनती भी नेताओं को सही से याद नहीं है। जहां अंग्रेजी हुकू मत की पंजाब सरक ार की रिपोर्ट में बाग में 379 लोगों के मारे जाने की बात स्वीकारी गई थी, वहीं अमृतसर सेवा सोसायटी ने उसी समय 530 शहीदों की सूची तैयार की थी। जबकि आजाद भारत सरकार का कोई अधिकारिक दस्तावेज अब तक जलियांवाला बाग में मारे गए लोगों को शहीद ही नहीं मानता। शहीद हरिराम बल के पौत्र भूषण बहल 1980 से जलियांवाला बाग के शहीदों को स्वतंत्रता सेनानी घोषित करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। अब वह 60 के हो चुके हैं। इनके संघर्ष का ही नतीजा है कि सोलह लोगों के वारिसों का पता लग गया है।&lt;br /&gt;    December 13, 2009 3:24 AM&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3049490265168027919-7041282254957918872?l=jaago--india--jaago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jaago--india--jaago.blogspot.com/feeds/7041282254957918872/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3049490265168027919&amp;postID=7041282254957918872' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3049490265168027919/posts/default/7041282254957918872'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3049490265168027919/posts/default/7041282254957918872'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jaago--india--jaago.blogspot.com/2010/02/blog-post_7079.html' title='शहीदों के खानदान ही खत्म!'/><author><name>जागो--इंडिया--जागो</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03601506380058079689</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3049490265168027919.post-1870975173746831723</id><published>2010-02-10T08:56:00.002-08:00</published><updated>2010-02-10T08:58:03.102-08:00</updated><title type='text'>ठहरे पानी में हलचल</title><content type='html'>काश, ठहरे पानी में हलचल हो&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;... मेरे देश की संसद मौन है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एम. अखलाक&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक आदमी रोटी बेलता है, दूसरा सेंकता है, तीसरा न बेलता है न सेंकता है, सिर्फ खाता है। मैं पूछता हूं- तीसरा कौन है? मेरे देश की संसद मौन है। मैं इन चर्चित पंक्तियों से अपनी बात शुरू करता हूं। संभव है सतीश चंद्र श्रीवास्तव जी ने जो सवाल उठाए हैं, उनका जवाब सामने आ जाए। 62 साल में ही भारतीय लोकतंत्र की यह दुर्दशा होगी, यदि स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को इस बात का आभास होता तो शायद ही वे जंग-ए-आजादी के मैदान में कूदते! आजादी के बाद भारत का बंटवारा लोकतंत्र की दुर्दशा की शुरुआत थी। समय दर समय यह रूप बदल कर हमारे सामने आता गया, आता गया और हम खामोश रहे, संसद की तरह। हमने कभी आवाम बनकर संसद से पूछने की जुर्रत नहीं की कि वह 'तीसरा' कौन है? भाई सतीश जी ने जलियावाला बाग का जो 'दृश्य' शब्दों में दिखाने की कोशिश की है, वह शायद दुर्दशा का आखिरी एपीसोड ही है! क्योंकि जिस तेजी से हमने ग्लोबल दुनिया रूपी गुलामी में इंट्री मारी है, उससे तो मानना ही पड़ेगा कि जंग-ए-आजादी का मकसद अब खत्म हो चुका है। हम कह सकते हैं कि हमें सिर्फ 60-62 साल की ही आजादी मिली थी। देश में दूसरा दौर शुरू हो चुका है। मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी से भी पहले नरसिम्हाराव ने इसकी बुनियाद रख दी थी। शहीद और शहीदों की कहानियां अब सिर्फ सुनने-सुनाने के लिए हैं। ठीक वैसे ही जैसे हम 15 अगस्त और 26 जनवरी के दिन ब्रिटिश हुकूमत की 'कहानियां' सुनाते हैं, भूल जाते हैं। जहां तक सरकार की बात है तो हुजूर आपकी सरकार बची ही कहां है? भ्रम तोडि़ए, सरकार आपसे नहीं, अमेरिका से चल रही है, विश्व बैंक के पैसों से चल रही है। क्या बचा है आपका आपके हिन्दुस्तान में, जिसे गर्व से कह सकें कि अपना है। सब कुछ तो बदल गया, जो बचा है वह भी बदल रहा है, बदल जाएगा। सो अंत में यही कहूंगा- तख्त बदल दो, ताज बदल दो, यदि कूवत है तो गद्दारों का राज बदल दो। और यह संभव है आप जैसे विचारशील साथियों से। आपकी आवाज ठहरे पानी में हलचल पैदा करे, क्रांति की आवाज बने, इसमें मैं भागीदार बनूं, यह आकांक्षा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्री एम. अखलाक युवा क्रांतिकारी पत्रकार के रूप में जाने जाते हैं। पत्रकारीय जीवन का सफलतापूर्वक निर्वहन करते हुए वे कई सामाजिक सरोकारों से भी जुड़े हुए हैं। इनसे मिलिए www.reportaaz.blogspot.com पर।&lt;br /&gt;Posted by Kaushal at 1:12 AM&lt;br /&gt;Reactions:   &lt;br /&gt;6 comments:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शरद कोकास said...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    कवि धूमिल को नमन ।&lt;br /&gt;    December 12, 2009 5:47 AM &lt;br /&gt;परमजीत बाली said...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    हम लोग सिर्फ आशा कर सकते हैं....लेकिन कुछ कर नही सकते......आज पैसे के बल पर सब खरीदा बेचा जाता है......वोट हो या आदमी का जमीर।फिर भी उम्मीद पर दुनिया कायम है। ....&lt;br /&gt;    December 12, 2009 11:30 AM &lt;br /&gt;शंकर फुलारा said...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    ठहरे पानी में हलचल तो अब बाबा रामदेव ने मचा दी है. बस, कुछ को समझ आ गयी है, कुछ समझना नहीं चाहते, कुछ दूर रह कर तमाशा देखना चाहते हैं. वैसे आपके विचार और भावना बहुत मिलती है.&lt;br /&gt;    December 13, 2009 12:58 PM &lt;br /&gt;Kaushal said...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    जलियांवाला बाग के शहीदों को सम्मान दिलाने के लिए श्री अखलाक जी की टिप्पणी के साथ होने वाले श्री शरद कोकस जी, श्री परमजीत बाली जी और श्री शंकर फुलारा जी को बहुत-बहुत धन्यवाद। निश्चित ही इस आवाज से शहीदों की आत्मा को शांति पहुंच रही होगी।&lt;br /&gt;    December 13, 2009 1:47 PM &lt;br /&gt;ब्रजेश said...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    मेरे देश की संसद मौन है, वाह, वाह। मुझे तो लगता है कि इस लेख के बाद मौन टूटेगा।&lt;br /&gt;    December 13, 2009 1:49 PM &lt;br /&gt;sanjayupadhyay said...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    Your opinion about the leader of our country is perfect. Theme of your story will work like inspirator of our socity.&lt;br /&gt;    December 14, 2009 8:35 AM&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3049490265168027919-1870975173746831723?l=jaago--india--jaago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jaago--india--jaago.blogspot.com/feeds/1870975173746831723/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3049490265168027919&amp;postID=1870975173746831723' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3049490265168027919/posts/default/1870975173746831723'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3049490265168027919/posts/default/1870975173746831723'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jaago--india--jaago.blogspot.com/2010/02/blog-post_2556.html' title='ठहरे पानी में हलचल'/><author><name>जागो--इंडिया--जागो</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03601506380058079689</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3049490265168027919.post-6960030821364536643</id><published>2010-02-10T08:56:00.001-08:00</published><updated>2010-02-10T08:56:32.811-08:00</updated><title type='text'>शहीदों के बहाने</title><content type='html'>जलियांवाला बाग के शहीदों के बहाने&lt;br /&gt;जलियांवाला बाग के शहीदों की याद में, उन्हें और उनके परिजनों को सम्मान दिलाने की खातिर मेरे मित्रों सतीश चंद्र श्रीवास्तव ने, फिर एम. अखलाक ने, फिर रविकांत ने जो कुछ लिखा, कहा और जितना आक्रोश व्यक्त किया, वह सिर्फ उस मानवीय संवेदना को ही उभारते हैं, जहां से इंसानी कर्म व क्रिया की सचाई व सहजता सक्रिय होती है। पर, राजकाज इससे इतर चीज है। क्या है राजकाज, इसे जानने के लिए थोड़ा गांधी को पढ़ना होगा, थोड़ा लोहिया को और थोड़ा जयप्रकाश को भी। इसके बाद आजादी प्राप्ति के बाद से राजकाज का पल में तोला, पल में मासा वाले मिजाज को भी गहराई से समझना होगा। इतने के बाद यदि समझदारी बची रहे तो कीजिए जलियांवाला बाग के शहीदों और उनके परिजनों को खोजने का काम।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोहिया जीवन भर चिल्लाते रहे, समाजवाद की बात करते रहे, असली हिन्दुस्तान का राग अलापते रहे, पर न महात्मा गांधी ने उनकी सुनी, न जवाहर लाल ने। इंदिरा गांधी के काल में तो लोहिया ने भी मान लिया था कि अव उनके अवसान का समय आ गया है और वे भी कुछ नहीं कर सकते हैं। जयप्रकाश का भी कमोबेश यही हाल रहा। चमकते सूरज की तरह प्रतिभा रखने वाले और पूज्य बापू की तरह गांव और गरीबों के पक्षधऱ इस दिव्य ज्योति के जीवन में ही सर्वोदय का सूरज डूब गया था। देश भर में आज भी इसका दर्द महसूस किया जाता है। रुंधे गलों के साथ यह आम सुना जाता है कि जेपी के चेलों ने भी जेपी की राह पर चलना गंवारा नहीं किया। हां, एक नीतीश बचे हैं, जो जेपी आंदोलनकारियों को पेंशन दे रहे हैं और इस पर कई टीका टिप्पणियां चल रही हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आजादी प्राप्ति के अभी महज ६२ वर्ष ही तो हुए हैं और गैट से गुजरते हम अमेरिका की तर्ज पर छब्बीस बाई ग्यारह मना रहे हैं। तालिबान और अलकायदा देश में घुस कर फुंफकार रहे हैं। चीन अरुणाचल में बाजा बजा रहा है, नेपाल की सरकार विरोध में खड़ी है, जबकि बांग्लादेश हमारे सैनिकों की लाशों को हमारे पास भेज रहा है। देश के अंदर देखते-देखते प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री तक उड़ा दिए जा रहे हैं। कब किस मुख्यमंत्री का हेलिकाप्टर गायब हो जाए और बाद में उसकी लाश बरामद हो, कहा नहीं जा सकता। कभी छह घंटे काम को सर्वाधिक मान कर शान से घर जाकर हसीन सपने देखने वाली जमात २४ में १६-१६ घंटे काम कर रही है और वह इस दुर्दशा को किसी के सामने कह तक नहीं पा रही है। आधुनिकता के साथ अपराधों का कहरो सितम चल रहा है और जिंदा तस्वीरें दिन-रात स्याह हो रही हैं। और हैरत है कि उन्हें देखने वाला सच में कहीं कोई नहीं दिखता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे में भाइयों ने जलियांवाला बाग का मामला उठा दिया है, वहां शहीद हुए जांबाजों का मामला उठा दिया है, उन शहीदों के परिजनों की खोज का मामला उठा दिया है। मैं यह नहीं कहता कि गलत किया है। सही किया है। शुरू में ही कह दिया कि ये मानवीय कर्म व क्रिया की सचाई व सहजता के सक्रिय होने का शुरूआती लक्षण है। पर, जहां जिंदा तस्वीरें अपने ही देश में (कभी मुंबई में तो कभी असम में तो कभी पंजाब में) गद्दार और बाहरी का तमगा हासिल कर जिल्लत झेल रही हो, जिन्हें शहीद बना देने के लिए पूरी की पूरी कौम आमादा हो और उन्हें कोई रोक नहीं पा रहा हो, वैसी हालत में जलियांवाला बाग के शहीदों के लिए मैं किस दिल से उम्मीद पालूं, मुझे समझ में नहीं आता। सतीश भाई की आवाज कौन सुनेगा, यह समझ में नहीं आता। यह समझ में नहीं आता कि पार्टियों दर पार्टियों में बंटे देश, जातियों दर जातियों में बंटे मुल्क, पैसे दर पैसे में फंसे वतन की तकदीर आखिर जिन लोगों के हाथों में सिमट कर रह गई है, उन हाथों से जलियांवाला बाग की तकदीर आखिर फिर से कैसे लिखी जा सकेगी? आखिर कैसे??&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहीं पढ़ा था - जीना हो तो मौत को गले लगाना पड़ेगा। मैं मानता हूं - जिन्होंने मौत को गले लगा लिया, वे जीवित हैं, जिंदा है, उन्हें कोई नहीं मिटा सकता। कोई नहीं।&lt;br /&gt;Posted by Kaushal at 12:02 AM&lt;br /&gt;Reactions:   &lt;br /&gt;7 comments:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देवेन्द्र said...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    आपके विचार से मैं सहमत हूं। देश की वर्तमान हालत चिंताजनक है। महंगाई बेलगाम हो चुकी है, अपराध औऱ आतंकवाद चरम पर है। क्षेत्रीयतावाद का बोलवाला है। ऐसे में शहीदों की ओर किसका ध्यान जाता है?&lt;br /&gt;    December 19, 2009 7:14 PM &lt;br /&gt;ब्रजेश said...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    आलेख बड़ी चिंता की ओर ले जा रहा है। इन चिंताओं का समाधान किए बिना देश बचने वाला भी नहीं। देखें हमारे सिरमौरों को कुछ ख्याल आता भी है या नहीं?&lt;br /&gt;    December 19, 2009 7:18 PM &lt;br /&gt;chandra said...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    कहीं पढ़ा था - जीना हो तो मौत को गले लगाना पड़ेगा। मैं मानता हूं - जिन्होंने मौत को गले लगा लिया, वे जीवित हैं, जिंदा है, उन्हें कोई नहीं मिटा सकता। कोई नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    वाह क्या बात कही।&lt;br /&gt;    December 19, 2009 7:20 PM &lt;br /&gt;संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari said...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    सत्‍य कह रहे हैं आप, जिन लोगों को यह आलेख पढना चाहिए वे तो खर्राटे ले रहे हैं.&lt;br /&gt;    धन्‍यवाद धारदार विचार के लिए.&lt;br /&gt;    December 19, 2009 8:58 PM &lt;br /&gt;एम अखलाक said...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    हां, जेपी की राह पर चलना इसलिए जरूरी नहीं है कि ये भटके हुए समाजवादी थे। नीतीश का आपने इकलौता चेला घोषित करने की कोशिश की है। लाठी तो लालू यादव खाए थे, पीठ पर। लेकिन मैं इन दोनों को समाजद्रोही मानता हूं। दोनों की कार्यशैली में कोई फर्क नहीं। एक बड़बोला है तो दूसरा घुईंसमुंह।&lt;br /&gt;    बढ़िया बीज से ही अंकुरण की उम्‍मीद किसानों को होती है। जेपी के रास्‍ते दुरुस्‍त होते तो ऐसे चेले पैदा नहीं हुए होते। इसलिए जेपी के लोगों की वकालत बंद कीजिए। अब तो जेपी आंदोलनकारी ही जेपी के इन चेलों को खारिज कर रहे हैं। आइए मिलकर सोचें नया रास्‍ता क्‍या हो सकता है।&lt;br /&gt;    December 20, 2009 1:29 PM &lt;br /&gt;Devendra said...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    आधुनिकता के साथ अपराधों का कहरो सितम चल रहा है और जिंदा तस्वीरें दिन-रात स्याह हो रही हैं। और हैरत है कि उन्हें देखने वाला सच में कहीं कोई नहीं दिखता।&lt;br /&gt;    --बहुत खूब.&lt;br /&gt;    December 20, 2009 6:01 PM &lt;br /&gt;mitthu said...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    आपके ब्लॉग से कुछ दिन दूर रहने के लिए खेद है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    घटाटोप की स्थिति है इस वक़्त । विचारधारा के स्तर पर भी और राजनितिक परिदृश्य के लिहाज से भी। आपकी चिंता यह अहसास करती है कि विचारों का द्वंद्व जारी है। एक समाधान जरूर निकल आएगा...&lt;br /&gt;    भवेश&lt;br /&gt;    December 20, 2009 6:22 PM&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3049490265168027919-6960030821364536643?l=jaago--india--jaago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jaago--india--jaago.blogspot.com/feeds/6960030821364536643/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3049490265168027919&amp;postID=6960030821364536643' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3049490265168027919/posts/default/6960030821364536643'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3049490265168027919/posts/default/6960030821364536643'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jaago--india--jaago.blogspot.com/2010/02/blog-post_8345.html' title='शहीदों के बहाने'/><author><name>जागो--इंडिया--जागो</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03601506380058079689</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3049490265168027919.post-8348454819348326512</id><published>2010-02-10T08:56:00.000-08:00</published><updated>2010-02-10T08:56:27.866-08:00</updated><title type='text'>शहीदों के बहाने</title><content type='html'>जलियांवाला बाग के शहीदों के बहाने&lt;br /&gt;जलियांवाला बाग के शहीदों की याद में, उन्हें और उनके परिजनों को सम्मान दिलाने की खातिर मेरे मित्रों सतीश चंद्र श्रीवास्तव ने, फिर एम. अखलाक ने, फिर रविकांत ने जो कुछ लिखा, कहा और जितना आक्रोश व्यक्त किया, वह सिर्फ उस मानवीय संवेदना को ही उभारते हैं, जहां से इंसानी कर्म व क्रिया की सचाई व सहजता सक्रिय होती है। पर, राजकाज इससे इतर चीज है। क्या है राजकाज, इसे जानने के लिए थोड़ा गांधी को पढ़ना होगा, थोड़ा लोहिया को और थोड़ा जयप्रकाश को भी। इसके बाद आजादी प्राप्ति के बाद से राजकाज का पल में तोला, पल में मासा वाले मिजाज को भी गहराई से समझना होगा। इतने के बाद यदि समझदारी बची रहे तो कीजिए जलियांवाला बाग के शहीदों और उनके परिजनों को खोजने का काम।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोहिया जीवन भर चिल्लाते रहे, समाजवाद की बात करते रहे, असली हिन्दुस्तान का राग अलापते रहे, पर न महात्मा गांधी ने उनकी सुनी, न जवाहर लाल ने। इंदिरा गांधी के काल में तो लोहिया ने भी मान लिया था कि अव उनके अवसान का समय आ गया है और वे भी कुछ नहीं कर सकते हैं। जयप्रकाश का भी कमोबेश यही हाल रहा। चमकते सूरज की तरह प्रतिभा रखने वाले और पूज्य बापू की तरह गांव और गरीबों के पक्षधऱ इस दिव्य ज्योति के जीवन में ही सर्वोदय का सूरज डूब गया था। देश भर में आज भी इसका दर्द महसूस किया जाता है। रुंधे गलों के साथ यह आम सुना जाता है कि जेपी के चेलों ने भी जेपी की राह पर चलना गंवारा नहीं किया। हां, एक नीतीश बचे हैं, जो जेपी आंदोलनकारियों को पेंशन दे रहे हैं और इस पर कई टीका टिप्पणियां चल रही हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आजादी प्राप्ति के अभी महज ६२ वर्ष ही तो हुए हैं और गैट से गुजरते हम अमेरिका की तर्ज पर छब्बीस बाई ग्यारह मना रहे हैं। तालिबान और अलकायदा देश में घुस कर फुंफकार रहे हैं। चीन अरुणाचल में बाजा बजा रहा है, नेपाल की सरकार विरोध में खड़ी है, जबकि बांग्लादेश हमारे सैनिकों की लाशों को हमारे पास भेज रहा है। देश के अंदर देखते-देखते प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री तक उड़ा दिए जा रहे हैं। कब किस मुख्यमंत्री का हेलिकाप्टर गायब हो जाए और बाद में उसकी लाश बरामद हो, कहा नहीं जा सकता। कभी छह घंटे काम को सर्वाधिक मान कर शान से घर जाकर हसीन सपने देखने वाली जमात २४ में १६-१६ घंटे काम कर रही है और वह इस दुर्दशा को किसी के सामने कह तक नहीं पा रही है। आधुनिकता के साथ अपराधों का कहरो सितम चल रहा है और जिंदा तस्वीरें दिन-रात स्याह हो रही हैं। और हैरत है कि उन्हें देखने वाला सच में कहीं कोई नहीं दिखता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे में भाइयों ने जलियांवाला बाग का मामला उठा दिया है, वहां शहीद हुए जांबाजों का मामला उठा दिया है, उन शहीदों के परिजनों की खोज का मामला उठा दिया है। मैं यह नहीं कहता कि गलत किया है। सही किया है। शुरू में ही कह दिया कि ये मानवीय कर्म व क्रिया की सचाई व सहजता के सक्रिय होने का शुरूआती लक्षण है। पर, जहां जिंदा तस्वीरें अपने ही देश में (कभी मुंबई में तो कभी असम में तो कभी पंजाब में) गद्दार और बाहरी का तमगा हासिल कर जिल्लत झेल रही हो, जिन्हें शहीद बना देने के लिए पूरी की पूरी कौम आमादा हो और उन्हें कोई रोक नहीं पा रहा हो, वैसी हालत में जलियांवाला बाग के शहीदों के लिए मैं किस दिल से उम्मीद पालूं, मुझे समझ में नहीं आता। सतीश भाई की आवाज कौन सुनेगा, यह समझ में नहीं आता। यह समझ में नहीं आता कि पार्टियों दर पार्टियों में बंटे देश, जातियों दर जातियों में बंटे मुल्क, पैसे दर पैसे में फंसे वतन की तकदीर आखिर जिन लोगों के हाथों में सिमट कर रह गई है, उन हाथों से जलियांवाला बाग की तकदीर आखिर फिर से कैसे लिखी जा सकेगी? आखिर कैसे??&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहीं पढ़ा था - जीना हो तो मौत को गले लगाना पड़ेगा। मैं मानता हूं - जिन्होंने मौत को गले लगा लिया, वे जीवित हैं, जिंदा है, उन्हें कोई नहीं मिटा सकता। कोई नहीं।&lt;br /&gt;Posted by Kaushal at 12:02 AM&lt;br /&gt;Reactions:   &lt;br /&gt;7 comments:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देवेन्द्र said...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    आपके विचार से मैं सहमत हूं। देश की वर्तमान हालत चिंताजनक है। महंगाई बेलगाम हो चुकी है, अपराध औऱ आतंकवाद चरम पर है। क्षेत्रीयतावाद का बोलवाला है। ऐसे में शहीदों की ओर किसका ध्यान जाता है?&lt;br /&gt;    December 19, 2009 7:14 PM &lt;br /&gt;ब्रजेश said...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    आलेख बड़ी चिंता की ओर ले जा रहा है। इन चिंताओं का समाधान किए बिना देश बचने वाला भी नहीं। देखें हमारे सिरमौरों को कुछ ख्याल आता भी है या नहीं?&lt;br /&gt;    December 19, 2009 7:18 PM &lt;br /&gt;chandra said...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    कहीं पढ़ा था - जीना हो तो मौत को गले लगाना पड़ेगा। मैं मानता हूं - जिन्होंने मौत को गले लगा लिया, वे जीवित हैं, जिंदा है, उन्हें कोई नहीं मिटा सकता। कोई नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    वाह क्या बात कही।&lt;br /&gt;    December 19, 2009 7:20 PM &lt;br /&gt;संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari said...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    सत्‍य कह रहे हैं आप, जिन लोगों को यह आलेख पढना चाहिए वे तो खर्राटे ले रहे हैं.&lt;br /&gt;    धन्‍यवाद धारदार विचार के लिए.&lt;br /&gt;    December 19, 2009 8:58 PM &lt;br /&gt;एम अखलाक said...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    हां, जेपी की राह पर चलना इसलिए जरूरी नहीं है कि ये भटके हुए समाजवादी थे। नीतीश का आपने इकलौता चेला घोषित करने की कोशिश की है। लाठी तो लालू यादव खाए थे, पीठ पर। लेकिन मैं इन दोनों को समाजद्रोही मानता हूं। दोनों की कार्यशैली में कोई फर्क नहीं। एक बड़बोला है तो दूसरा घुईंसमुंह।&lt;br /&gt;    बढ़िया बीज से ही अंकुरण की उम्‍मीद किसानों को होती है। जेपी के रास्‍ते दुरुस्‍त होते तो ऐसे चेले पैदा नहीं हुए होते। इसलिए जेपी के लोगों की वकालत बंद कीजिए। अब तो जेपी आंदोलनकारी ही जेपी के इन चेलों को खारिज कर रहे हैं। आइए मिलकर सोचें नया रास्‍ता क्‍या हो सकता है।&lt;br /&gt;    December 20, 2009 1:29 PM &lt;br /&gt;Devendra said...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    आधुनिकता के साथ अपराधों का कहरो सितम चल रहा है और जिंदा तस्वीरें दिन-रात स्याह हो रही हैं। और हैरत है कि उन्हें देखने वाला सच में कहीं कोई नहीं दिखता।&lt;br /&gt;    --बहुत खूब.&lt;br /&gt;    December 20, 2009 6:01 PM &lt;br /&gt;mitthu said...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    आपके ब्लॉग से कुछ दिन दूर रहने के लिए खेद है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    घटाटोप की स्थिति है इस वक़्त । विचारधारा के स्तर पर भी और राजनितिक परिदृश्य के लिहाज से भी। आपकी चिंता यह अहसास करती है कि विचारों का द्वंद्व जारी है। एक समाधान जरूर निकल आएगा...&lt;br /&gt;    भवेश&lt;br /&gt;    December 20, 2009 6:22 PM&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3049490265168027919-8348454819348326512?l=jaago--india--jaago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jaago--india--jaago.blogspot.com/feeds/8348454819348326512/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3049490265168027919&amp;postID=8348454819348326512' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3049490265168027919/posts/default/8348454819348326512'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3049490265168027919/posts/default/8348454819348326512'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jaago--india--jaago.blogspot.com/2010/02/blog-post_10.html' title='शहीदों के बहाने'/><author><name>जागो--इंडिया--जागो</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03601506380058079689</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3049490265168027919.post-1774070985721050884</id><published>2010-02-10T08:43:00.000-08:00</published><updated>2010-02-10T08:43:29.529-08:00</updated><title type='text'>लाश की राजनीति</title><content type='html'>Sunday, December 13, 2009&lt;br /&gt;इन्हें लाश की राजनीति में भी शर्म नहीं आती!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी अपराधी की लाश और देश को बचाने के लिए मौत को गले लगा लेने वाले शहीदों की लाश में कोई फर्क नहीं???&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रविकांत प्रसाद&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रसंग-एक : निठारी कांड का एक पात्र सुरेन्द्र कोली, जो छोटे-छोटे बच्चों को टुकड़ों में काटकर उसका गोश्त खाता था। फिलहाल जेल में हैं। कोली की चर्चा छिड़ते ही लोगों के चेहरे पर घृणा के भाव उभर आते हैं, जबकि वह अपने जुर्म की सजा भुगत रहा है। कोली जैसे हत्यारे ने अपने जघन्य अपराध को माना।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रसंग-दो : दिल्ली में गए वर्ष हुए एक बम विस्फोट की जानकारी जब तत्कालीन गृह मंत्री को मिली तो उन्होंने पहले सूट बदला, पाउडर चपोड़े, फिर देखने गए कि कितने लोग मारे गए हैं? गृह मंत्री ने मरे लोगों के शवों पर कथक करने से पहले खुद को सजा-संवार लिया था। इस घटना के कुछ ही माह बाद ये पद से हट गए, परंतु इन्हें कभी पछतावा नहीं हुआ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रसंग-तीन : झारखंड राज्य बनने के पहले राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद बिहार के मुख्यमंत्री थे। इन्होंने एक भाषण में कहा था कि उनके शव पर ही राज्य का बंटवारा होगा। यानी जीते जी वे बंटवारे की बात को स्वीकार नहीं करेंगे। कुछ दिनों बाद झारखंड स्वतंत्र राज्य बना। लालू प्रसाद अब भी राजनीति कर रहे हैं। इन्हें कोई पछतावा नहीं कि झारखंड बनने से बिहार कमजोर हो गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सतीश श्रीवास्तव जी, आपके लेख जलियांवाला बाग के खानदान ही खत्म! मैंने पढ़ा। आपको बधाई कि आपने एक ऐसे विषय को छुआ, जिसे लाशों पर राजनीति करने वाले इतिहास का मरा पात्र भी मानने को तैयार नहीं हैं। आपके लेख से मस्तिष्क में 'आइला' उठा, उसे शांत करने के लिए उक्त प्रसंगों का सहारा लेना पड़ा। जिस देश के नेता को जलियांवाला बाग के शहीद को शहीद मानने में परेशानी हो रही है, इनके लिए कौन-सा शब्द इस्तेमाल किया जाए। इसपर पर गंभीरता से विचार करना होगा?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाल ही में मनसे नेताओं ने सपा विधायक अबू आजमी को हिन्दी में शपथ लेने के लिए प्रताडि़त किया था। मनसे नेताओं को शायद मां को मां कहने में भी शर्म आती है। ऐसे विचारधारा के नेता भला शहीद को शहीद आसानी से कैसे कहेंगे, कैसे मान लेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जलियांवाला बाग की घटना तो भारतीय के मुंह पर अंग्रेजों का एक ऐसा तमाचा था, जिससे भारतीय टूट जाए, झूक जाए। परंतु इसी घटना ने भारत में आजादी की ऐसी मशाल जलाई, जिसमें अंग्रेज धू-धूकर जल गए। केन्द्र व राज्य सरकारों ने स्वतंत्रता सेनानियों को तो कई सुविधाएं दीं, क्योंकि ये जिंदा हैं, वोट दे सकते हैं, इन्हें गद्दी पर बिठा सकते हैं। परंतु 1919 में घटी जलियांवाला बाग की घटना के शहीदों को अबतक शहीद का दर्जा न मिलना वास्तव में चिंतनीय है। इसमें मारे गए शहीदों की गिनती भी नेताओं को सही से याद नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जहां अंग्रेजी हुकूमत की पंजाब सरकार की रिपोर्ट में बाग में 379 लोगों के मारे जाने की बात स्वीकारी गई थी, वहीं अमृतसर सेवा सोसायटी ने उसी समय 530 शहीदों की सूची तैयार की थी। जबकि, आजाद भारत सरकार का कोई आधिकारिक दस्तावेज अब तक जलियांवाला बाग में मारे गए लोगों को शहीद ही नहीं मानता। यह हैरत भरा है। शहीद हरिराम बल के पौत्र भूषण बहल 1980 से जलियांवाला बाग के शहीदों को स्वतंत्रता सेनानी घोषित करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। अब वह 60 के हो चुके हैं। इनके संघर्ष का ही नतीजा है कि सोलह लोगों के वारिसों का पता लग गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरकार में थोड़ी सी भी चेतना बची हो, थोड़ा सा भी देशप्रेम बचा हो तो उसका पहला काम जलियांवाला बाग के शहीदों और शहीदों के परिवारों को सम्मान दिलाना ही होना चाहिए। पर, ऐसा हो पाएगा, कहना मुश्किल है। देखना यह है कि लाश की राजनीति करने वाले गली में किसी मुठभेड़ में मार गिराए गए अपराधी की लाश और देश को बचाने के लिए मौत को गले लगा लेने वाले शहीदों की लाश में कब फर्क करते हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(प्रखर पत्रकार श्री रविकांत प्रसाद से आप www.journalism-ravikant.blogspot.com पर मिल सकते हैं।- कौशल)&lt;br /&gt;Posted by Kaushal at 1:13 PM&lt;br /&gt;Reactions:   &lt;br /&gt;4 comments:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परमजीत बाली said...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    अभी कोई उम्मीद नही है ....&lt;br /&gt;    December 13, 2009 2:15 PM &lt;br /&gt;स्वच्छ संदेश: हिन्दोस्तान की आवाज़ said...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    लाश तो लाश है जी, ये राजनीती है ही ...ड़वों का खेल !!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    सलीम खान&lt;br /&gt;    December 13, 2009 4:04 PM &lt;br /&gt;AlbelaKhatri.com said...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    gande aur ghinaavne khel ka ek lamaabaa silsila chalaa a raha hai...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    band toh hoga&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    magar kab hoga ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    ye wakt hi bataayega......&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    __bahut hi saarthak post&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    __badhaai !&lt;br /&gt;    December 13, 2009 7:06 PM &lt;br /&gt;sanjayupadhyay said...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    what a mind you have. you are the reasearcher. yor new step is fine. This can give great result in future.&lt;br /&gt;    December 13, 2009 9:53 PM&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3049490265168027919-1774070985721050884?l=jaago--india--jaago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jaago--india--jaago.blogspot.com/feeds/1774070985721050884/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3049490265168027919&amp;postID=1774070985721050884' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3049490265168027919/posts/default/1774070985721050884'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3049490265168027919/posts/default/1774070985721050884'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jaago--india--jaago.blogspot.com/2010/02/blog-post.html' title='लाश की राजनीति'/><author><name>जागो--इंडिया--जागो</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03601506380058079689</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3049490265168027919.post-4306315485263117568</id><published>2010-02-10T08:36:00.000-08:00</published><updated>2010-02-10T08:38:48.384-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जलियांवाला बाग के शहीदों के बहाने'/><title type='text'></title><content type='html'>जलियांवाला बाग के शहीदों के बहाने&lt;br /&gt;जलियांवाला बाग के शहीदों की याद में, उन्हें और उनके परिजनों को सम्मान दिलाने की खातिर मेरे मित्रों सतीश चंद्र श्रीवास्तव ने, फिर एम. अखलाक ने, फिर रविकांत ने जो कुछ लिखा, कहा और जितना आक्रोश व्यक्त किया, वह सिर्फ उस मानवीय संवेदना को ही उभारते हैं, जहां से इंसानी कर्म व क्रिया की सचाई व सहजता सक्रिय होती है। पर, राजकाज इससे इतर चीज है। क्या है राजकाज, इसे जानने के लिए थोड़ा गांधी को पढ़ना होगा, थोड़ा लोहिया को और थोड़ा जयप्रकाश को भी। इसके बाद आजादी प्राप्ति के बाद से राजकाज का पल में तोला, पल में मासा वाले मिजाज को भी गहराई से समझना होगा। इतने के बाद यदि समझदारी बची रहे तो कीजिए जलियांवाला बाग के शहीदों और उनके परिजनों को खोजने का काम।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोहिया जीवन भर चिल्लाते रहे, समाजवाद की बात करते रहे, असली हिन्दुस्तान का राग अलापते रहे, पर न महात्मा गांधी ने उनकी सुनी, न जवाहर लाल ने। इंदिरा गांधी के काल में तो लोहिया ने भी मान लिया था कि अव उनके अवसान का समय आ गया है और वे भी कुछ नहीं कर सकते हैं। जयप्रकाश का भी कमोबेश यही हाल रहा। चमकते सूरज की तरह प्रतिभा रखने वाले और पूज्य बापू की तरह गांव और गरीबों के पक्षधऱ इस दिव्य ज्योति के जीवन में ही सर्वोदय का सूरज डूब गया था। देश भर में आज भी इसका दर्द महसूस किया जाता है। रुंधे गलों के साथ यह आम सुना जाता है कि जेपी के चेलों ने भी जेपी की राह पर चलना गंवारा नहीं किया। हां, एक नीतीश बचे हैं, जो जेपी आंदोलनकारियों को पेंशन दे रहे हैं और इस पर कई टीका टिप्पणियां चल रही हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आजादी प्राप्ति के अभी महज ६२ वर्ष ही तो हुए हैं और गैट से गुजरते हम अमेरिका की तर्ज पर छब्बीस बाई ग्यारह मना रहे हैं। तालिबान और अलकायदा देश में घुस कर फुंफकार रहे हैं। चीन अरुणाचल में बाजा बजा रहा है, नेपाल की सरकार विरोध में खड़ी है, जबकि बांग्लादेश हमारे सैनिकों की लाशों को हमारे पास भेज रहा है। देश के अंदर देखते-देखते प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री तक उड़ा दिए जा रहे हैं। कब किस मुख्यमंत्री का हेलिकाप्टर गायब हो जाए और बाद में उसकी लाश बरामद हो, कहा नहीं जा सकता। कभी छह घंटे काम को सर्वाधिक मान कर शान से घर जाकर हसीन सपने देखने वाली जमात २४ में १६-१६ घंटे काम कर रही है और वह इस दुर्दशा को किसी के सामने कह तक नहीं पा रही है। आधुनिकता के साथ अपराधों का कहरो सितम चल रहा है और जिंदा तस्वीरें दिन-रात स्याह हो रही हैं। और हैरत है कि उन्हें देखने वाला सच में कहीं कोई नहीं दिखता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे में भाइयों ने जलियांवाला बाग का मामला उठा दिया है, वहां शहीद हुए जांबाजों का मामला उठा दिया है, उन शहीदों के परिजनों की खोज का मामला उठा दिया है। मैं यह नहीं कहता कि गलत किया है। सही किया है। शुरू में ही कह दिया कि ये मानवीय कर्म व क्रिया की सचाई व सहजता के सक्रिय होने का शुरूआती लक्षण है। पर, जहां जिंदा तस्वीरें अपने ही देश में (कभी मुंबई में तो कभी असम में तो कभी पंजाब में) गद्दार और बाहरी का तमगा हासिल कर जिल्लत झेल रही हो, जिन्हें शहीद बना देने के लिए पूरी की पूरी कौम आमादा हो और उन्हें कोई रोक नहीं पा रहा हो, वैसी हालत में जलियांवाला बाग के शहीदों के लिए मैं किस दिल से उम्मीद पालूं, मुझे समझ में नहीं आता। सतीश भाई की आवाज कौन सुनेगा, यह समझ में नहीं आता। यह समझ में नहीं आता कि पार्टियों दर पार्टियों में बंटे देश, जातियों दर जातियों में बंटे मुल्क, पैसे दर पैसे में फंसे वतन की तकदीर आखिर जिन लोगों के हाथों में सिमट कर रह गई है, उन हाथों से जलियांवाला बाग की तकदीर आखिर फिर से कैसे लिखी जा सकेगी? आखिर कैसे??&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहीं पढ़ा था - जीना हो तो मौत को गले लगाना पड़ेगा। मैं मानता हूं - जिन्होंने मौत को गले लगा लिया, वे जीवित हैं, जिंदा है, उन्हें कोई नहीं मिटा सकता। कोई नहीं।&lt;br /&gt;Posted by Kaushal at 12:02 AM 7 comments&lt;br /&gt;Reactions:   &lt;br /&gt;Sunday, December 13, 2009&lt;br /&gt;इन्हें लाश की राजनीति में भी शर्म नहीं आती!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी अपराधी की लाश और देश को बचाने के लिए मौत को गले लगा लेने वाले शहीदों की लाश में कोई फर्क नहीं???&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रविकांत प्रसाद&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रसंग-एक : निठारी कांड का एक पात्र सुरेन्द्र कोली, जो छोटे-छोटे बच्चों को टुकड़ों में काटकर उसका गोश्त खाता था। फिलहाल जेल में हैं। कोली की चर्चा छिड़ते ही लोगों के चेहरे पर घृणा के भाव उभर आते हैं, जबकि वह अपने जुर्म की सजा भुगत रहा है। कोली जैसे हत्यारे ने अपने जघन्य अपराध को माना।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रसंग-दो : दिल्ली में गए वर्ष हुए एक बम विस्फोट की जानकारी जब तत्कालीन गृह मंत्री को मिली तो उन्होंने पहले सूट बदला, पाउडर चपोड़े, फिर देखने गए कि कितने लोग मारे गए हैं? गृह मंत्री ने मरे लोगों के शवों पर कथक करने से पहले खुद को सजा-संवार लिया था। इस घटना के कुछ ही माह बाद ये पद से हट गए, परंतु इन्हें कभी पछतावा नहीं हुआ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रसंग-तीन : झारखंड राज्य बनने के पहले राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद बिहार के मुख्यमंत्री थे। इन्होंने एक भाषण में कहा था कि उनके शव पर ही राज्य का बंटवारा होगा। यानी जीते जी वे बंटवारे की बात को स्वीकार नहीं करेंगे। कुछ दिनों बाद झारखंड स्वतंत्र राज्य बना। लालू प्रसाद अब भी राजनीति कर रहे हैं। इन्हें कोई पछतावा नहीं कि झारखंड बनने से बिहार कमजोर हो गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सतीश श्रीवास्तव जी, आपके लेख जलियांवाला बाग के खानदान ही खत्म! मैंने पढ़ा। आपको बधाई कि आपने एक ऐसे विषय को छुआ, जिसे लाशों पर राजनीति करने वाले इतिहास का मरा पात्र भी मानने को तैयार नहीं हैं। आपके लेख से मस्तिष्क में 'आइला' उठा, उसे शांत करने के लिए उक्त प्रसंगों का सहारा लेना पड़ा। जिस देश के नेता को जलियांवाला बाग के शहीद को शहीद मानने में परेशानी हो रही है, इनके लिए कौन-सा शब्द इस्तेमाल किया जाए। इसपर पर गंभीरता से विचार करना होगा?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाल ही में मनसे नेताओं ने सपा विधायक अबू आजमी को हिन्दी में शपथ लेने के लिए प्रताडि़त किया था। मनसे नेताओं को शायद मां को मां कहने में भी शर्म आती है। ऐसे विचारधारा के नेता भला शहीद को शहीद आसानी से कैसे कहेंगे, कैसे मान लेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जलियांवाला बाग की घटना तो भारतीय के मुंह पर अंग्रेजों का एक ऐसा तमाचा था, जिससे भारतीय टूट जाए, झूक जाए। परंतु इसी घटना ने भारत में आजादी की ऐसी मशाल जलाई, जिसमें अंग्रेज धू-धूकर जल गए। केन्द्र व राज्य सरकारों ने स्वतंत्रता सेनानियों को तो कई सुविधाएं दीं, क्योंकि ये जिंदा हैं, वोट दे सकते हैं, इन्हें गद्दी पर बिठा सकते हैं। परंतु 1919 में घटी जलियांवाला बाग की घटना के शहीदों को अबतक शहीद का दर्जा न मिलना वास्तव में चिंतनीय है। इसमें मारे गए शहीदों की गिनती भी नेताओं को सही से याद नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जहां अंग्रेजी हुकूमत की पंजाब सरकार की रिपोर्ट में बाग में 379 लोगों के मारे जाने की बात स्वीकारी गई थी, वहीं अमृतसर सेवा सोसायटी ने उसी समय 530 शहीदों की सूची तैयार की थी। जबकि, आजाद भारत सरकार का कोई आधिकारिक दस्तावेज अब तक जलियांवाला बाग में मारे गए लोगों को शहीद ही नहीं मानता। यह हैरत भरा है। शहीद हरिराम बल के पौत्र भूषण बहल 1980 से जलियांवाला बाग के शहीदों को स्वतंत्रता सेनानी घोषित करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। अब वह 60 के हो चुके हैं। इनके संघर्ष का ही नतीजा है कि सोलह लोगों के वारिसों का पता लग गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरकार में थोड़ी सी भी चेतना बची हो, थोड़ा सा भी देशप्रेम बचा हो तो उसका पहला काम जलियांवाला बाग के शहीदों और शहीदों के परिवारों को सम्मान दिलाना ही होना चाहिए। पर, ऐसा हो पाएगा, कहना मुश्किल है। देखना यह है कि लाश की राजनीति करने वाले गली में किसी मुठभेड़ में मार गिराए गए अपराधी की लाश और देश को बचाने के लिए मौत को गले लगा लेने वाले शहीदों की लाश में कब फर्क करते हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(प्रखर पत्रकार श्री रविकांत प्रसाद से आप www.journalism-ravikant.blogspot.com पर मिल सकते हैं।- कौशल)&lt;br /&gt;Posted by Kaushal at 1:13 PM 4 comments&lt;br /&gt;Reactions:   &lt;br /&gt;Saturday, December 12, 2009&lt;br /&gt;काश, ठहरे पानी में हलचल हो&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;... मेरे देश की संसद मौन है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एम. अखलाक&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक आदमी रोटी बेलता है, दूसरा सेंकता है, तीसरा न बेलता है न सेंकता है, सिर्फ खाता है। मैं पूछता हूं- तीसरा कौन है? मेरे देश की संसद मौन है। मैं इन चर्चित पंक्तियों से अपनी बात शुरू करता हूं। संभव है सतीश चंद्र श्रीवास्तव जी ने जो सवाल उठाए हैं, उनका जवाब सामने आ जाए। 62 साल में ही भारतीय लोकतंत्र की यह दुर्दशा होगी, यदि स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को इस बात का आभास होता तो शायद ही वे जंग-ए-आजादी के मैदान में कूदते! आजादी के बाद भारत का बंटवारा लोकतंत्र की दुर्दशा की शुरुआत थी। समय दर समय यह रूप बदल कर हमारे सामने आता गया, आता गया और हम खामोश रहे, संसद की तरह। हमने कभी आवाम बनकर संसद से पूछने की जुर्रत नहीं की कि वह 'तीसरा' कौन है? भाई सतीश जी ने जलियावाला बाग का जो 'दृश्य' शब्दों में दिखाने की कोशिश की है, वह शायद दुर्दशा का आखिरी एपीसोड ही है! क्योंकि जिस तेजी से हमने ग्लोबल दुनिया रूपी गुलामी में इंट्री मारी है, उससे तो मानना ही पड़ेगा कि जंग-ए-आजादी का मकसद अब खत्म हो चुका है। हम कह सकते हैं कि हमें सिर्फ 60-62 साल की ही आजादी मिली थी। देश में दूसरा दौर शुरू हो चुका है। मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी से भी पहले नरसिम्हाराव ने इसकी बुनियाद रख दी थी। शहीद और शहीदों की कहानियां अब सिर्फ सुनने-सुनाने के लिए हैं। ठीक वैसे ही जैसे हम 15 अगस्त और 26 जनवरी के दिन ब्रिटिश हुकूमत की 'कहानियां' सुनाते हैं, भूल जाते हैं। जहां तक सरकार की बात है तो हुजूर आपकी सरकार बची ही कहां है? भ्रम तोडि़ए, सरकार आपसे नहीं, अमेरिका से चल रही है, विश्व बैंक के पैसों से चल रही है। क्या बचा है आपका आपके हिन्दुस्तान में, जिसे गर्व से कह सकें कि अपना है। सब कुछ तो बदल गया, जो बचा है वह भी बदल रहा है, बदल जाएगा। सो अंत में यही कहूंगा- तख्त बदल दो, ताज बदल दो, यदि कूवत है तो गद्दारों का राज बदल दो। और यह संभव है आप जैसे विचारशील साथियों से। आपकी आवाज ठहरे पानी में हलचल पैदा करे, क्रांति की आवाज बने, इसमें मैं भागीदार बनूं, यह आकांक्षा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्री एम. अखलाक युवा क्रांतिकारी पत्रकार के रूप में जाने जाते हैं। पत्रकारीय जीवन का सफलतापूर्वक निर्वहन करते हुए वे कई सामाजिक सरोकारों से भी जुड़े हुए हैं। इनसे मिलिए www.reportaaz.blogspot.com पर।&lt;br /&gt;Posted by Kaushal at 1:12 AM 6 comments&lt;br /&gt;Reactions:   &lt;br /&gt;Thursday, December 10, 2009&lt;br /&gt;शहीदों के खानदान ही खत्म!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ढूंढे़ नहीं मिल रहे जलियांवाला बाग में मारे गए लोगों के परिजन। शर्म! शर्म!! शर्म!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सतीश चंद्र श्रीवास्तव&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देश को आजादी की प्रेरणा देने वाले जलियांवाला बाग के शहीदों के खानदान ही खत्म हो गए हैं। आजादी के 62 साल बाद इस दुर्गति पर न तो संसद में एक बार भी आवाज उठी है और न ही अब तक आर्डर! आर्डर!! आर्डर!!! वाला कोई वाकया ही सामने आया है। जाहिर है जिन लोगों ने स्वतंत्रता आंदोलन में जान गंवाई, उनके खानदान में ही कोई नामलेवा नहीं बचा। ऐसे में उन शहीदों की आवाज कौन उठाए? वर्तमान समय में इस मुद्दे को उठाने की प्रासंगिकता पर भी सवाल खड़े होते हैं। लोग पूछते हैं, गडे़ मुर्दे क्यों उखाड़ते हो? लेकिन मामला मौजूं हो गया है। केंद्र सरकार ने एक साल पहले शहीदों को स्वतंत्रता सेनानी मान तो लिया था, परंतु अब तक उनकी आधिकारिक सूची तक तैयार नहीं हो सकी है। मारे गए हजारों लोगों में से सिर्फ 16 लोगों के वारिसों का पता लगाया जा सका है। घटना के 90 साल और आजादी के 62 साल बाद यह शहीदों के प्रति उदासीनता क्या कम शर्मनाक है! कहते हैं, जो कौम अपने शहीदों का सम्मान नहीं करती, उसका विनाश हो जाता है। विश्व के हर कोने में इसके उदाहरण भरे पड़े हैं। ऐसे में समझ लेने की जरूरत है ही कि देश के नेता भारत के किस भविष्य का निर्माण कर रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;14 दिसंबर 2008 को केंद्र सरकार ने जलियांवाला बाग कांड, 1919 के शहीदों को स्वतंत्रता सेनानियों की सूची में शामिल करने का आधिकारिक आदेश जारी किया था। देश के सभी अखबारों और चैनलों पर प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और अंबिका सोनी की तस्वीरों से युक्त विज्ञापन प्रकाशित और प्रसारित किया गया। अब एक साल बाद सिर्फ 16 शहीदों के परिजनों का पता लगा पाना क्या कौम के खात्मे का गंभीर संकेत नहीं दे रहा? क्या पूंजीवाद और भूमंडलीकरण के दौर में राष्ट्रीयता और राष्ट्रभक्ति जैसी बातें अप्रासंगिक और दकियानूसी नहीं हो गई हैं? परंतु इस बात का जवाब भी तो सोचना पड़ेगा कि राष्ट्रीय हितों की उपेक्षा करके अमेरिका-इंग्लैंड ही नहीं, चीन और जापान भी कोई कदम क्यों नहीं नहीं उठाते? ऐसे में भारतीय व्यवस्था आखिर किनके हाथों में खेल रही है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सवालों में इतिहासकार&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतिहास के पन्नों में सभी ने पढ़ा है कि 13 अप्रैल 1919 को 'वैशाखी वाले दिन' जनरल डॉयर के नेतृत्व में ब्रिटिश फौज ने अमृतसर के जलियांवाला बाग में निहत्थे लोगों पर अंधाधुंध फायरिंग की थी। हजारों की संख्या में लोग मारे गए थे। इतिहासकारों के पास इस बात का जवाब नहीं है कि किसे भ्रम में डालने के लिए और किसकी चापलूसी करते हुए पुस्तकों में 'वैशाखी वाले दिन' का इस्तेमाल किया गया। हकीकत यह है कि अमृतसर में वैशाखी मेला की कोई परंपरा नहीं है। पंजाब में वैशाखी का मेला आनंदपुर साहिब में लगता है। जलियांवाला बाग में न पहले कभी मेला लगता था और न आज ही कोई परंपरागत आयोजन होता है। कड़वी सचाई यह भी है कि आज के अमृतसर में पांच प्रतिशत लोग भी नहीं जानते कि मजदूर और मानवाधिकारों के विरोधी रॉलेट एक्ट के खिलाफ 31 मार्च और 6 अप्रैल को पूर्ण बंदी तथा 9 अप्रैल को रामनवमी के जुलूस में हिंदू-मुस्लिम एकता ने अंग्रेजों को हिला कर रख दिया था। आंदोलन प्रभावित करने के लिए 10 अप्रैल 1919 को प्रमुख नेता डा. सैफुद्दीन किचलू और डा. सत्यपाल को गिरफ्तार किया गया तो युवा हिंसक हो उठे। अंग्रेजों पर हमला बोला। स्टेशन, बैंक, डाकघर को निशाना बनाया। देशभक्तों पर हुई फायरिंग में 35 शहीद हुए। 13 अप्रैल को इसी सिलसिले में शोकसभा थी, जिसमें 20 हजार से अधिक लोग मौजूद थे। मदन मोहन मालवीय के नेतृत्व में सेवा समिति के दल ने 1500 से अधिक शहीदों की सूची तैयार की थी। उक्त सूची अब गायब है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंग्रेजों के रिकार्ड और गजट के अनुसार 464 देशभक्त शहीद हुए थे। अमृतसर जिला प्रशासन और जलियांवाला बाग कमेटी ने 501 शहीदों की सूची तैयार की है। इनमें से सिर्फ 16 शहीदों के परिजनों का पता लगाया जा सका है। इनमें से 13 नाम जलियांवाला बाग शहीद परिवार समिति के अध्यक्ष भूषण बहल ने दिए हैं। सरकार सिर्फ तीन शहीद परिवारों को ही खोज सकी है। शहीदों की उपेक्षा की पोल खुलने के डर से पिछले एक साल से परिजनों को स्वतंत्रता सेनानी परिवार के रूप में स्वीकृति पत्र देने की प्रक्रिया तक शुरू नहीं की जा सकी है। हकीकत यह भी है कि जलियांवाला बाग में फायरिंग के बाद लगभग छह महीने तक गांवों के लोगों को भी अमृतसर आने-जाने नहीं दिया गया। सबूतों को खत्म करने का प्रयास किया गया। 13 अप्रैल की घटना को एक सप्ताह तक दबाए रखने की कोशिश हुई। जब देशवासियों को दर्दनाक कारनामों की जानकारी मिली तो पूरा देश जल उठा। कवियों ने जलियांवाला बाग को केंद्र में रखकर गीत लिखे। गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने सर की ब्रिटिश उपाधि लौटा दी। इस घटना के बाद ही महात्मा गांधी राष्ट्रीय नेता के रूप में उभरे। उन्हें अमृतसर पहुंचने के पहले ही गिरफ्तार कर लिया गया था। दूसरी तरफ सत्ता से जुड़े लोगों ने मामले को रफा दफा करने की हर संभव कोशिश की। पीडि़तों को बिना देरी मुआवजा दिया गया, ताकि विरोध के स्वर कम हों। इसके साथ ही भ्रम फैलाने का दौर शुरू हो गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विभाजन का दर्द&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सत्ता पर काबिज होने के लिए कुर्बानियों को कैसे कुर्बान किया जाता है, यह कोई जलियांवाला बाग की मिट्टी से पूछे। आजादी के आंदोलन में हिंदू-मुस्लिम एकता प्रतीक के रूप में उभरे अमृतसरवासियों को देश विभाजन ने सांप्रदायिक हिंसा में झोंक दिया। 9 अप्रैल 1919 को जिस अमृतसर के लोगों ने डा. हफीज मुहम्मद बशीर के नेतृत्व में रामनवमी का जुलूस निकाला था, वहीं के लोगों ने एक दूसरे का खून किया। विभाजन के दौरान 10 लाख लोग मारे गए। अमृतसर का स्वरूप ही बदल गया। मुस्लिम बहुल अमृतसर में बड़ी संख्या में हिंदू और सिख आबादी लाहौर और पेशावर से पलायन कर आ बसी। इधर जिन लोगों के परिजनों ने बाद में वतन के लिए शहादत दी थी, वे जैसे तैसे जिंदा बचे तो, पराया वतन के हो गए। पाकिस्तानी बना दिए गए। ऐसे में कोई क्यों लेगा जलियांवाला बाग के शहीदों की सुध। उनका खानदान या तो सांप्रदायिक खून-खराबे में खत्म हो गया या पलायन कर गया। जो बच गए, वह खौफ खाते हैं कि गलती से उनके देशभक्त परिवार से संबंधित होने का राज न खुल जाए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शहीद हरिराम बल के पौत्र भूषण बहल 1980 से जलियांवाला बाग केशहीदों को स्वतंत्रता सेनानी घोषित किए जाने के लिए संघर्ष कर रहे थे। अब वह 60 वर्ष के हो चुके हैं। उनके साथी 90 वर्षीय सोहनलाल भारती का परिवार अमृतसर में फाकाकशी के बाद दिल्ली में दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष कर रहा है। बाग कांड के समय सोहनलाल अपनी मां अमृतकौर के गर्भ में थे। इसी वीरांगना मां ने सुहाग लूटने वालों से मुआवजा लेने से इंकार कर दिया था। इसी तरह अमृतसर के चौक पासियां में 65 साल की उम्र में भी टेलीफोन बूथ चला कर गुजारा करने वाले नंदलाल अरोरा अपने शहीद दादा पर गर्व नहीं कर पाते। उन्हें पता है कि 1919 की घटना में अंग्रेजों का साथ देने वालों के पास आज गाड़ी-बंगले और उद्योग-धंधे हैं। वही लोग पैसे के बल पर अब नेता बन कर सरकार चला रहे हैं। इन सभी घटनाक्रमों पर जलियांवाला बाग का कण - कण गवाही दे रहा है, पर कोई सुनने को तैयार नहीं। आजादी के 62 साल बाद भी वहां शहीदों की सूची तक नहीं लग सकी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आजादी के बाद बाग&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जलियांवाला बाग को सुरक्षित रखने के नाम पर 1952 में संसद में ट्रस्ट बिल पास किया गया। पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू इसके अध्यक्ष बने। उस समय से ही सरकारी कब्जे में चल रहे बाग को अब तक राष्ट्रीय धरोहरों की सूची तक में शामिल नहीं किया जा सका है। संख्या का भ्रम बताकर शहीदों की सूची नहीं तैयार की जा रही। बुरी तरह घिरने केबाद 14 दिसंबर 2008 को भले ही सरकार ने बाग केशहीदों को स्वतंत्रता सेनानी घोषित कर दिया, पर अब तक एक भी परिवार को स्वतंत्रता सेनानी परिवार का दर्जा नहीं मिल सका है। सवाल दो स्तर पर है। ऐसी कृतघ्नता क्यों? इतनी देरी क्यों? इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि आजादी केबाद से ही जिस ट्रस्ट के अध्यक्ष देश के प्रधानमंत्री रहे हों, उसकी इस कदर उपेक्षा क्यों? प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह वर्ष 2007 से पदेन अध्यक्ष हैं, परंतु एक बार भी इस मसले पर मुंह नहीं खोल पाते तो संदेह और गहरा जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(प्रखर पत्रकार श्री सतीश मेरे मित्र हैं और पत्रकारिता के दौरान लगभग नौ साल उन्होंने अमृतसर में गुजारे हैं। जलियांवाला बाग के शहीदों को गति दिलाना उनका सपना है। देखें यह कब पूरे भारतवर्ष का सपना बनता है। यह सपना कब साकार होता है। -कौशल)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3049490265168027919-4306315485263117568?l=jaago--india--jaago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jaago--india--jaago.blogspot.com/feeds/4306315485263117568/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3049490265168027919&amp;postID=4306315485263117568' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3049490265168027919/posts/default/4306315485263117568'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3049490265168027919/posts/default/4306315485263117568'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jaago--india--jaago.blogspot.com/2010/02/sts-with-label.html' title=''/><author><name>जागो--इंडिया--जागो</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03601506380058079689</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3049490265168027919.post-4917345481218536315</id><published>2008-11-11T23:57:00.000-08:00</published><updated>2008-11-12T00:54:29.834-08:00</updated><title type='text'>कैसे पैदा होगा भारत का ओबामा</title><content type='html'>मुद्दा है भारतीय प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह से अमेरिकी  राष्ट्पति इन वेटिंग बराक ओबामा द्वारा बात नहीं करना । यह भले ही संयोग हो, लेकिन हुआ बहुत अच्छा है ।`अमेरिकी गांधी' मार्टिन लूथर किंग का सपना पूरा होने जा रहा है । आदमी को आदमी नहीं समझने वाले गोरों के देश में बराक ओबामा भावी राष्ट्रपति के रूप में चुने जा चुके हैं । वहीं के काले हैं जिस अफ्रीका में  भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने सत्य के प्रयोग शुरू किए थे । गांधी की प्रेरणा से पहले दक्षिण अफ्रीका आजाद हुआ और नेल्सन मंडेला वहां के राष्ट्रपति बने । अब बराक ओबामा सुपर पावर अमेरिकी में  आम आदमी के प्रति संवेदना के प्रतीक के रूप में राष्ट्रपति बनने जा रहे हैं । अभी वह सिर्फ प्रतीक हैं क्योंकि अमेरिका में असली सत्ता उन कार्पोरेटों के हाथ में है, जो हर हाल में सबकुछ बेचना जानते हैं। इराक सहित अरब देशों पर इसलिए हमला बोल देते हैं कि तेल के भंडारों पर कब्जा कायम रह सके । ओबामा सही में आम आदमी के प्रतीक बने रह पाएंगे या कोर्पोरेटों के हाथों में खिलौना बन हथियार और ड्रग्स माफियाओं (कारोबारियों ) के हितों के पोषक हो जाएंगे, यह आने वाले समय में तय होना है । अभी तो मुद्दा बात नहीं करना है । यह भले ही संयोग हो, लेकिन हुआ बहुत अच्छा है । इसमें दो राय नहीं कि डा. मनमोहन भारत के आम आदमी की पसंद नहीं हैं । उनपर तथा उनके प्रिय मोंटेक सिंह पर वर्ल्ड बैंक का ... होने का आरोप लगता रहा है । डा. मनमोहन किसी व्यक्ति विशेष (महिला) की पसंद है। दूसरी तरफ ओबामा आवाम की पसंद हैं । असली मुद्दा तो यह है कि जिस गांधी बाबा ने काले अफ्रीकियों के दिलों में जागृति के दीप जला दिए, उनके अपने देश में ओबामा कब पैदा होगा । जरा गौर से देख लें । भारत की  सत्ता पर अभी भी गोरों के दलाल ही काबिज हैं । वही राज कर रहे हैं जिनके दादा - परदादाओं ने अंग्रेजों की दलाली की थी । स्वतंत्रता सेनानियों को तो पहले ही भुला दिया गया था, आजादी को बचाए रखने के लिए कुर्बानी देने वाले देश के 75 लाख फौजी भी उपेक्षा के शिकार हैं । आंदोलन कर रहे हैं । जरा अपने अगल बगल देखें । कितने विधायक और सांसद ऐसे हैं  जिनके पूर्वजों ने अंग्रेजों की दलाली नहीं की । गिने - चुने होंगे । कुछ ईमानदारी का चोला ओढ़े रूस और चीन के दलाल नजर आएंगे तो कुछ पूंजीवादी  अमेरिका और यूरोप के । कुछ कार्पोरेट घरानों के दलाल । कुछ जाति के दलाल, कुछ संप्रदाय और पंथ के तो कुछ धर्म के दलाल मिलेंगे । आम भारतीय का प्रतिनिधि किस तरह सत्ता शीर्ष पर पहुंचेगा । गांधी के रूप में आम भारतीय को सत्ता शीर्ष पर पहुंचाने का जय प्रकाश नारायण ने एक बार प्रयास तो  किया था, लेकिन तब तक वह खुद बहुत बूढ़े हो गए थे । उनके बाइ-प्रोडक्ट या यूं कहें वेस्ट प्रोडक्ट भी दलाली कर सत्ता शीर्ष पर पहुंच गए ।  बहुत कम होंगे जिन्हें लोकसभा भेजने के लिए आम जनता अपने पल्ले से खर्च करती है । ऐसे भारत को झटका देकर ओबामा ने कुछ गलत किया क्या ?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3049490265168027919-4917345481218536315?l=jaago--india--jaago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jaago--india--jaago.blogspot.com/feeds/4917345481218536315/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3049490265168027919&amp;postID=4917345481218536315' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3049490265168027919/posts/default/4917345481218536315'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3049490265168027919/posts/default/4917345481218536315'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jaago--india--jaago.blogspot.com/2008/11/blog-post.html' title='कैसे पैदा होगा भारत का ओबामा'/><author><name>जागो--इंडिया--जागो</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03601506380058079689</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3049490265168027919.post-4220139607777503927</id><published>2008-10-21T05:45:00.001-07:00</published><updated>2008-10-24T04:36:53.281-07:00</updated><title type='text'>जलियांवाला बाग</title><content type='html'>घटना के 90 और आजादी के 61 साल बाद जलियांवाला बाग मुद्दे पर नए दृष्टिकोण से चर्चा का अवसर मिलना सौभाग्यपूर्ण है। सौभाग्य इसलिए कि इसी बहाने हमें जीवंतता के साथ इतिहास के पन्नों को खोलने का मौका मिला है। इतिहास में भागीदारी के मार्ग खुले हैं। कुछ बुद्धिजीवियों को सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक दृष्टिकोण से घटना क्रम को समझने और सत्य की खोज के लिए नए सिरे से अपने दिमाग को झकझोरने की प्रेरणा भी मिल जाए, तो अमृतसर के खालसा कालेज का यह प्रयास सफल मानना गलत नहीं होगा। यह वही कालेज है जिसके प्रिंसिपल जीएस बैथन ने 14 अप्रैल 1919 को गुरु की नगरी अमृतसर पर हवाई हमले का डटकर विरोध किया। सबक सीखाने को उतावले अपने हम वतनों को रोक दिया था। यह वही कालेज है जहां के बड़ी संख्या में छात्र घटना में प्रत्यक्ष गवाह और भागीदार थे।&lt;br /&gt;चर्चा के केंद्र में घटना की तारीख वही है, 13 अप्रैल 1919। परंतु मरने वालों की संख्या आज भी तय नहीं है। कोई साढ़े तीन सौ, कोई साढ़े चार सौ तो कोई 1300 बताता है। यानी जिस घटना को अंग्रेजों ने अपने साम्राज्य के पतन की शुरुआत के रूप में देखा, उसके शहीदों की संख्या आज भी आलू - प्याज या फिर कहें शेयर बाजार की कीमतों की तरह कभी उछाल मारती, तो कभी मुंह के बल गिर पड़ती है। जिस घटना के बाद राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा कि अगर पलासी के युद्ध के बाद ब्रिटिश सामाज्य का विस्तार शुरु हुआ था तो जलियांवाला बाग की घटना के बाद अंत। क्या सही में ऐसी थी जलियांवाला बाग की घटना। तो फिर जलियांवाला बाग के शहीद आज भी हमारे फ्रीडम फाइटर क्यों नहीं हैं ? क्या कहा, फ्रीडम फाइटर नहीं हैं ! स्वतंत्रता सेनानी नहीं हैं ? जी हां! &lt;br /&gt;जलियांवाला बाग के शहीद भारत की आजादी के 61 साल बाद भी फ्रीडम फाइटर नहीं हैं।&lt;br /&gt;यही है मेरी तरफ से पूरी चर्चा का केंद्र। बिना किसी लाग लपेट के कहूंगा, यही है भारत की असली तस्वीर। हर साल 13 अप्रैल को यह सुन सुन कर कान पक चुका है ---&lt;br /&gt;`जो कौम अपने शहीदों का सम्मान नहीं करता वह कौम मर जाता है।'&lt;br /&gt;अगर यह सही है तो जलियांवाला बाग के शहीदों को नकारने वाले कौम के बारे में बुद्धिजीवी क्या राय रखेंगे ?&lt;br /&gt;- जवाब होगा, नहीं। हम वाइब्रेंट इंडिया (जीवंत भारत) के नागरिक हैं। तेजी से तरक्की कर रहे हैं। दकियानूस विचारधारा वाले ही कौम के मरने जैसी बात कर सकते हैं। यह देश जीवंत है। जिंदा है।&lt;br /&gt;लेकिन इसे स्वीकारने में असहज नहीं होना चाहिए कि कौम का साइज (आकार) भी आजादी के पहले और बाद के पंजाब के आकार की तरह बड़े से छोटा हो गया है। कंप्यूटर और वैश्वीकरण के दौर में ग्लोबल विलेज की बात करते समय कभी महाराष्ट्र, तो कभी जम्मू कश्मीर, तो कभी नार्थ इस्ट के असम व अन्य राज्यों में कौम के उभरे नए कांसेप्ट पर चर्चा करने को दिल मचल उठता है। तभी तो किसी कवि मन कराह उठता है --&lt;br /&gt;ऐ कौम देख तेरी हालत को क्या हुआ&lt;br /&gt;हैरत में है आईना सूरत को क्या हुआ&lt;br /&gt;जिसने बड़े बड़ों के छक्के छुड़ा दिए&lt;br /&gt;उस शूर - वीर कौम की हिम्मत का क्या हुआ ?&lt;br /&gt;इसी के साथ कुछ सवाल भी खड़े हो जाते हैं -----&lt;br /&gt;- क्या देश के वर्तमान हालात अपने शहीदों और आजादी के लिए कुर्बानी देने वालों की उपेक्षा का नतीजा नहीं है ? &lt;br /&gt;- क्या स्वतंत्रता सेनानियों ने जिस आजादी का सपना देखा था, वो पूरा हुआ ?&lt;br /&gt;अगर नहीं, तो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का विश्लेषण और जरूरी हो जाता है। एक तरफ बड़ी संख्या में फर्जी फ्रीडम फाइटरों ने आजादी के बाद सरकारी स्कीमों का लाभ उठाया। दूसरी तरफ यह ध्यान देने की जरूरत है कि असली फ्रीडम फाइटर असली आजादी, दूसरी आजादी की बात करते हुए एक के बाद एक कर गुमनामी की मौत मरते गए। &lt;br /&gt;- जरा गौर करें, सत्ता पर कौन काबिज हैं ? जो काबिज हैं, उनकी पिछली पीढ़ियों की कारगुजारियों को जनता के समक्ष रखना बुद्धिजीवियों की खोज का विषय बन सकता है।&lt;br /&gt;इन्हीं वजहों से जलियांवाला बाग जीवंत हो उठता है। जलियांवाला बाग को इतिहास के पन्नों से बाहर निकाल कर देखने और समझने की जरूरत है। पहले चर्चा आम अमृतसरियों में 13 अप्रैल 1919 की घटना बारे सोच की। अमृतसर के लगभग 90 प्रतिशत निवासी लोग मानते हैं कि -----&lt;br /&gt;1. लोग गांवों से बैशाखी मनाने स्वर्ण मंदिर पहुंचे थे। वही जलियांवाले बाग में मेला देखने पहुंच गए थे।&lt;br /&gt;2. अंग्रेजों ने निर्दोष लोगों पर गोलियां चलाई थीं।&lt;br /&gt;3. बाग में लोग ताश खेल रहे थे और आराम कर रहे थे, सो रहे थे।&lt;br /&gt;4. मारे गए लोग बाग में टहलने के लिए पहुंचे थे।&lt;br /&gt;5. मारे गए लोगों को स्वतंत्रता सेनानी नहीं कहा जा सकता क्योंकि वह मोर्चा लेने नहीं गए थे। भाषण सुन रहे थे। ऐसे भी लोग थे जो सिर्फ तमाशा देखने पहुंचे थे।&lt;br /&gt;6. फायरिंग होने पर लोग भागने लगे थे। भगौड़े थे। पीठ में गोलियां खाईं।&lt;br /&gt;7. बाग में लोगों पर फायरिंग एक `घटना' थी, आंदोलन नहीं।&lt;br /&gt;8. घटना में मारे गए लोगों के परिजनों को तत्कालीन सरकार ने चार हजार से 20 हजार रुपये तक का मुआवजा दे दिया था जो सोने की वर्तमान कीमतों के आधार पर 20 लाख से एक करोड़ रुपये तक बनता है।&lt;br /&gt;और अंत में कुछ नहीं चलता है तो पलायन का फार्मूला है ---&lt;br /&gt;9. कुछ तो कारण होगा जिसकी वजह से नहीं मिला दर्जा। &lt;br /&gt;कितनी गंभीर बात है। कुछ लोग इन बातों को शर्मनाक भी कहेंगे। लेकिन स्वीकारना होगा कि आम लोगों के बीच इस तरह के भ्रम के कारण हैं। यह कुटनीतिक फंडा है, किसी कौम को मारना हो तो उसका सम्मान मार देना चाहिए। किसी को अतिवादी कहकर तो किसी को अति उदारवादी बताकर नकार दो। पूरी व्यवस्था ही नकारी हुई हो जाएगी ।61 सालों में देश का सिर्फ बंटवारा ही तो हुआ है। कभी जाति, धर्म, संप्रदाय और पंथ के नाम पर तो कभी क्षेत्र और भाषा के नाम पर । बिना देरी जवाब भी दिया जाना चाहिए। कितनी गंभीर बात है कि मात्र 90 वर्ष बाद ही हम अपने स्वतंत्रता सेनानियों पर इतने गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं । इतिहास बदला हुआ है। यानी 90 साल पहले की घटना के बारे हम इतने गलत विचार रख रहे हैं, तो पांच सौ, पांच हजार साल पुराने इतिहास के बारे में हमारी समझ और ज्ञान कितना सही होगा? यह तो इतिहासकार बताएं। सोचें और विचारें । देश के कोने - कोने में ऐसे स्वतंत्रता सेनानी हैं जिन्होंने  फ्रीडम फाइटर के नाम पर दी जाने वाली सुविधाएं नकारीं। क्या हम उन्हें ही नकार कर उनकी शहादत की कीमत दे रहे हैं।देश के हर कोने में ऐसे शहीद हैं जिन्हें हमने स्वतंत्रता सेनानी नहीं माना । देश के हर इलाके में असली स्वतंत्रता सेनानियों के अपमान के प्रमाण बुद्धिजीवियों को ललकार रहे हैं।  देश की प्रगति चाहते हो तो युवाओं मे देश भक्ति का जजबा भरना होगा । अन्यथा प्रतिभाओं के अमेरिका - इंगलैंड पलायन को नहीं रोका जा सकेगा ।बिना लाग लपेट, झूठ फरेब, चिंता फिक्र के बुद्धिजीवियों को बुद्धिजीवी बने रहने का मनोबल तैयार करना होगा । चाटूकारिता छोड़ हमें देश के इतिहास को दिल , दिमाग व दृष्टि के साथ लिखने की हिम्मत करनी होगी। सत्ता पर कब्जे के लिए सच को झूठ बनाने के खेलों को फेल करने के लिए सच्चाइयों का पर्दाफाश करना होगा ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; अब जरा जलियांवाला बाग के शहीदों  की उपेक्षा के कारणों पर गौर करें। ----- &lt;br /&gt;1. 1947 में भारत - पाकिस्तान बंटवारा हुआ। पंजाब, बंगाल और कश्मीर आदि बंट गए। पहले अमृतसर में मुसलमानों की बड़ी आबादी थी। बंटवारे के बाद पाकिस्तान से आए लोग यहां दंगे के कारण खाली हुए घरों पर काबिज हो गए। यहीं आजादी के साथ अमृतसर की आबादी ही बदल गई।&lt;br /&gt;2. जलियांवाला बाग में 1919 में मारे गए अधिकांश लोग शहर के निवासी थे। कुछ लोग आसपास के गांवों के भी मारे गए थे। घटना के बाद अमृतसर शहर में गांवों के लोगों के प्रवेश पर लंबे समय तक पाबंदी रही। मार्शल लॉ लगा दिया गया था। यह बात बताने की जरूरत नहीं कि पहले अधिकांश जाट (सिख) आबादी गांवों में रहती थी। शहर में हिंदू और मुसलमान ज्यादा थे। आजादी के बाद जनसंख्यात्मक ढांचा ही बदल गया।&lt;br /&gt;3. गंभीरता से विचारें - क्या अंग्रेज पहले से ही फूट डालो और शासन करो की नीति पर काम कर रहे थे ? पहले सम्मेलन स्वर्ण मंदिर परिसर में होना था। वहां नहीं होने दिया गया। 1920 से गुरुद्वारा सुधार लहर की शुरुआत हो गई। 1925 में कानून बनाकर शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक ट्रस्ट (कमेटी) की स्थापन कर दी गई। आजादी की लड़ाई के बीच में ही अलग पहचान के जंग की शुरुआत ! रिसर्च का काम आगे बढ़े तो शायद कुछ मिल जाए। समय और सवाल के तार जुड़ते हैं।&lt;br /&gt;4. मारे गए लोग वैशाखी मनाने वाले नहीं थे। इस भ्रम को ठीक से दूर कर लेना चाहिए कि जलियांवाला बाग में जमा हुए लोगों का वैशाखी से कोई रिश्ता नहीं था। वैशाखी के मौके पर स्नान करने पहुंचने वाले लोग सुबह - सुबह स्नान करते हैं। शाम चार - पांच बजे नहीं। दूर - दूर से आए लोग एक दिन पहले भले ही बाग में ठहरे हों, स्नान के बाद उनके ठहरने का मतलब नहीं। स्पष्टत: लोग सुबह - सुबह ही स्नान करके चले गए थे। घटना के लिए भीड़ का जमा होना दोपहर एक बजे के बाद शुरु हुआ था। फायरिंग की घटना शाम पांच बजे की है। &lt;br /&gt;5. यह कहना भी पूरी तरह गलत और भ्रम फैलाने वाला है कि अंग्रेजों ने निर्दोष लोगों पर गोलियां चलाई थीं। अमृतसर पहले से ही रालेट एक्ट के खिलाफ आंदोलन का केंद्र बना हुआ था। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के आह्वान पर 30 मार्च और 6 अप्रैल को दिल्ली और मुंबई के साथ अमृतसर में रहा पूर्ण बंद इसका प्रमाण है। 9 अप्रैल को रामनवमी के जुलूस का नेतृत्व घोड़े पर सवार होकर डा. हफीज मोहम्मद बशीर द्वारा किया जाना, अमृतसर के तत्कालीन डीसी माईल इरविन का घबराना इसका प्रमाण है कि अंग्रेज अंदर से हिल गए थे। तभी तो 10 अप्रैल को अहले सुबह डा. सैफुद्दीन किचलू और डा. सतपाल को गिरफ्तार कर लिया गया। बदले में हिंसा भड़की और 30 आंदोलनकारी मारे गए। &lt;br /&gt;6. वैशाखी के दिन 13 अप्रैल 1919 का समागम 10 अप्रैल की हिंसा में मारे गए लोगों के सम्मान में था। शोक सभा थी जिसकी अध्यक्षता डा. सतपाल और डा. किचलू की तस्वीरें कर रही थीं।&lt;br /&gt;7. यह बातें बहुत जोर से हाईलाइट की जाती हैं कि घटना के वक्त लोग बाग में सैर करने, आराम करने और ताश खेलने में व्यस्त थे। यह बहुत बड़ा झूठ है। दावे के साथ कह सकता हूं कि अमृतसर के किसी भी व्यक्ति को याद नहीं होगा कि किसी भी दिन जलियांवाला बाग में एक वक्त में 20 से 22 हजार लोगों का जमावड़ा देखा हो। अब तो वहां की सड़कें चौड़ी हो गई हैं। पहले तो गलियों से होकर बाग में घुसना तो और मुश्किल था। अगर 20 - 22 हजार लोगों में दो - चार - छह सौ लोग सैर, आराम और ताश में व्यस्त भी थे, तो कौन सी बड़ी बात है। इसे इनता मजबूती से क्यों बार - बार दुहराया गया कि हिटलर की रणनीति याद आ जाए, `झूठ को इतनी बार दुहराओ की सच नजर आने लगे।'&lt;br /&gt;8. यह बात पूरी तरह सच है कि बाग में जमा हुए लोगों के पास हथियार नहीं था। यह इस बात को मजबूती ही प्रदान करता है कि लोग शोक व्यक्त करने जमा हुए थे। संघर्ष करने नहीं। जो लोग बाग में जमा हुए थे, सभी वैचारिक तौर पर 10 अप्रैल 1919 को हुई 30 हिंदुस्तानियों की हत्या से बुरी तरह आहत थे। हथियार नहीं होने की बात करने वाले हाथ में एक लाठी लिए और बिना उसका बिना प्रयोग किए देश को आजादी के लिए आंदोलन पैदा कर देने वाले गांधी पर भी सवाल खड़ा करते हैं। ध्यान रखें, गांधी की लड़ाई हथियारों से नहीं, विचारों और सिद्धांतों से लड़ी गई। यही भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की विशेषता है। तर्क का विरोध करने वाले याद कर लें, दक्षिण अफ्रीका को भी गांधीवादियों ने 1980 के दशक में बिना हथियारों की लड़ाई लड़े स्वतंत्र कराया।&lt;br /&gt;यह मुद्दा क्यों   -----&lt;br /&gt;1. यह मुद्दा इसलिए कि इतिहासकार, राजनीति वैज्ञानिक, समाजशास्त्री, मनोवैज्ञानिक, कानूनविद, शिक्षाविद सहित समाज का प्रबुद्ध वर्ग विचार कर सके कि कहीं राष्ट्रभक्ति की कमी ही देश के वर्तमान हालात का कारण तो नहीं।&lt;br /&gt;2. यह मुद्दा इसलिए कि देश की समस्याओं के पीछे छीपे असली मर्ज की पहचान की जा सके  । कहते हैं कि बीमारी का पता चल जाए तो इलाज आसान हो जाता है।&lt;br /&gt;3. यह मुद्दा इसलिए कि जाति, धर्म, संप्रदाय, पंथ, मजहब, भाषा, क्षेत्र आदि के नाम पर देश तोड़ने के प्रयासों  का मुंहतोड़ जवाब दिया जा सके । &lt;br /&gt;4. यह मुद्दा इसलिए कि देश की एकता और अखंडता को बरकरार रखा जा सके ।   पलायन -  भगौड़ापन और भौंड़ापन खत्म हो सके जिसकी वजह से देश का वर्तमान हाल है  । पश्चिमी देशों से उधार में मिली दृष्टि के भरोसे देश न रहे । &lt;br /&gt;भाषण नहीं भागीदारी का वक्त ----&lt;br /&gt;इसलिए जरुरी है, जागो इंडिया जागो !!!&lt;br /&gt;इसके लिए सबसे पहले अमृतसरियों को जागना होगा । &lt;br /&gt;तभी कह सकेंगे, जागो इंडिया जागो !&lt;br /&gt;पंजाबियों को जागना होगा । देश को नेतृत्व देने का वक्त है ।&lt;br /&gt;तभी कह सकेंगे, जागो इंडिया जागो !!!&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3049490265168027919-4220139607777503927?l=jaago--india--jaago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jaago--india--jaago.blogspot.com/feeds/4220139607777503927/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3049490265168027919&amp;postID=4220139607777503927' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3049490265168027919/posts/default/4220139607777503927'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3049490265168027919/posts/default/4220139607777503927'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jaago--india--jaago.blogspot.com/2008/10/blog-post_789.html' title='जलियांवाला बाग'/><author><name>जागो--इंडिया--जागो</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03601506380058079689</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3049490265168027919.post-171686081122659140</id><published>2008-10-18T10:27:00.000-07:00</published><updated>2008-10-18T10:29:48.782-07:00</updated><title type='text'>काश ! शिव का विलाप काम आ जाए</title><content type='html'>काश ! शिव का विलाप काम आ जाए&lt;br /&gt;शिव विलाप कर रहे हैं। यह शिव, शिव चोपड़ा हैं। एनआरआई हैं। 50 साल पहले पढ़ लिखकर भाग गए थे कनाडा। माइक्रोबाइलोजी के विशेषज्ञ हैं। बड़ी - बड़ी दवा कंपनियों में काम किया। कनाडा सरकार को भी हिलाया। स्वीकार रहे हैं कि अपने घर (देश) में भ्रष्टाचार के कारण भागे थे। वैज्ञानिक महोदय साफ सुथरे तरीके से काम करना चाहते थे। बन कर रह गए थे मल्टीनेशनल कंपनियों के हाथ की कठपुतली। जब - जब विरोध किया, मुंह की खानी पड़ी। ज्यादा चालबाजी दिखाई तो कनाडा की संसद ने कानून को ही बदल डाला। जुबान पर ताला लगा दिया। अमेरिकी और यूरोपीय कंपनियों में वही सबकुछ हुआ, जिसके लिए भारत छोड़ा था। अब बूढ़े हो गए हैं तो मुंह उठाए फिर भारत ही लौट आए हैं। बता रहे हैं कि किस तरह कीटनाशक दवाओं से लेकर बीमारियों से लड़ने के लिए टीकों तक का कारोबार होता है। वैक्सिन के नाम पर कितना बड़ा बाजार है। कैसे इनकी वजह से हर आदमी को कैंसर का खतरा हो गया है। देश - विदेश के नेताओं को भी कोस रहे हैं और वैज्ञानिकों को भी। समझा रहे हैं कि पैसों के पीछे किस तरह सभी की नैतिकता बौनी पड़ जाती है। कभी अमृतसर के गुरु नानक देव विश्वविद्यालय में सेमिनार कर रहे हैं तो कभी गरीबों की सेवा में लगी संस्था पिंगलवाड़ा में खड़े होकर देश के पिंगलवाड़ा बन जाने का खतरा बता रहे हैं। कभी गुजरात के अहमदाबाद में जाकर नरेंद्र मोदी को लताड़ रहे हैं। कांग्रेसी हों या भाजपाई, सभी शिव चोपड़ा के निशाने पर हैं। कामरेडों पर भी गुनाह मढ़ने में देरी नहीं कर रहे। तर्कों में दम है। जमीन से जुड़ी बातें कर रहे हैं। गांधी को याद करते हुए दांडी मार्च, नमक सत्याग्रह और अंग्रेजों के भारत से भाग जाने का इतिहास दुहरा रहे हैं। बात बोरिंग हैं परंतु एक तो एनआरआई और ऊपर से पीएचडी विद्वान, देशी विद्वानों की मानों चीर कर हाथ में आ जा रही है। कोई कैसे सवाल उठाए, बाबा शिव 50 साल जो कनाडा में गुजारे तब क्यों नहीं समझ आई। क्या डर नहीं लगना चाहिए। सतर्क नहीं हो जाना चाहिए कि शिव जैसे नामों पर देश के कोने - कोने में भटकने वाले मल्टीनेशनलों के ही एजेंटों की भी कमी नहीं है। कभी एड्स के नाम पर सीरिंज का कारोबार तो कभी हेपेटाइटीस के नाम पर टीके। चेचक के टीके। और अंत में सारा फेल। नया खेल। नया टीका। और तब कंपनियों के बुद्धिजीवी इंप्लांट किए जाते हैं देखने के लिए कि भारत का बाजार कैसा है ?  सड़ा - गला माल बेचने की कितनी संभावनाएं हैं ? कहीं विद्रोह तो नहीं हो जाएगा ? शिव की बातों पर कोई सवाल नहीं है। उद्देश्य पर सवाल है। बुद्धि का उपयोग कौन करने जा रहा है ? अभी तक तो शिव चोपड़ा का इस्तेमाल कनाडा, अमेरिका और यूरोप की कंपनियों ने किया। शूट , बूट और टाई वाले शिव , इस देश को न छेड़ो। अभी यह सो रहा है। बेहतर हो यह खुद ही जाग जाए। अपने मिट्टी के प्रति वफादार लोगों द्वारा ही जगा दिया जाए। पूंजीवादी और साम्यवादी के संघर्ष में भारत का असली स्वरूप की खतरे में है। इस देश को जगना होगा। लेकिन जगाने वाला पश्चिम रिटर्न नहीं चाहिए। वैसे कोई एजराज भी नहीं अगर इस शिव का विलाप ही काम आ जाए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3049490265168027919-171686081122659140?l=jaago--india--jaago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jaago--india--jaago.blogspot.com/feeds/171686081122659140/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3049490265168027919&amp;postID=171686081122659140' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3049490265168027919/posts/default/171686081122659140'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3049490265168027919/posts/default/171686081122659140'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jaago--india--jaago.blogspot.com/2008/10/blog-post_18.html' title='काश ! शिव का विलाप काम आ जाए'/><author><name>जागो--इंडिया--जागो</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03601506380058079689</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3049490265168027919.post-5098189610273803879</id><published>2008-10-07T03:15:00.001-07:00</published><updated>2008-10-07T10:45:11.221-07:00</updated><title type='text'>अंबिका को दुबारा हुआ ढाई साल पुराना आश्चर्य !</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_1ch-f93mu3Q/SOugG28CFVI/AAAAAAAAAC4/M2gJrBp_jic/s1600-h/ambika.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://3.bp.blogspot.com/_1ch-f93mu3Q/SOugG28CFVI/AAAAAAAAAC4/M2gJrBp_jic/s320/ambika.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5254469429944784210" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;केंद्रीय संस्कृति व पर्यटन मंत्री अंबिका सोनी को ढाई साल बाद दुबारा आश्चर्य हुआ। इस बार आश्चर्य ढाई साल बाद भी जलियांवाला बाग के शहीदों को स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा नहीं मिल पाने को लेकर था। वह बाग ट्रस्ट की सदस्य भी हैं। 14 अप्रैल 2006 को जलियांवाला बाग के शहीदों को स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा नहीं होने बारे पहली बार खुलासा हुआ था। 24 अप्रैल 2006  को अंबिका सोनी वर्तमान हैसियत में ही अटारी बार्डर पर सुविधाओं के विकास कार्यक्रम में पहुंची थीं। नीम चमेली होटल को अमन - उम्मीद के नए नाम से नया रूप देने का उद्घाटन कर गईं। पहले तो उन्होंने मानने से इंकार कर दिया था कि जलियांवाला बाग के शहीदों को फ्रीडम फाइटर का दर्जा नहीं है। बाद में आश्चर्यचकित हो गई थीं। अब दिसंबर 2006 से बाग ट्रस्ट में मंत्री की हैसियत से मेंबर भी हैं। ढाई साल बाद अमन - उम्मीद (टूरिस्ट कंप्लेक्स) तैयार हो गया। अंबिका सोनी फिर उद्घाटन करने अमृतसर पहुंचीं। आजादी के 61 बाद जलियांवाला बाग के शहीदों की आत्माओं ने उन्हें फिर आश्चर्यचकित कर दिया हैं । दावे के अनुसार उन्हें दुख है कि अभी भी दर्जा नहीं मिला। पिछले दो-तीन दिनों से शहीदों को फ्रीडम फाइटर का दर्जा दिलाने के प्रयास में लग गई हैं। मानव संसाधन और गृह मंत्रालय से संपर्क साधा है। उनके हाथों में दस्तावेज भी सौंप दिए गए थे। हर पन्ना बोल रहा था, शहीद अभी भी फ्रीडम फाइटर नहीं। परंतु क्या इन शहीदों को अब सिर्फ मंत्री जी का ही आसरा है ? ढाई साल के लिए वह फिर याद भूल गईं तो!  पता नहीं अगले साल लोकसभा चुनाव के बाद कौन सत्ता पर काबिज हो जाए। क्या जरूरी नहीं कि देशवासी जागें और अपने शहीदों को सम्मान दिलाएं। हर वर्ग में देशभक्ति का जजबा जगाएं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3049490265168027919-5098189610273803879?l=jaago--india--jaago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jaago--india--jaago.blogspot.com/feeds/5098189610273803879/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3049490265168027919&amp;postID=5098189610273803879' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3049490265168027919/posts/default/5098189610273803879'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3049490265168027919/posts/default/5098189610273803879'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jaago--india--jaago.blogspot.com/2008/10/blog-post_07.html' title='अंबिका को दुबारा हुआ ढाई साल पुराना आश्चर्य !'/><author><name>जागो--इंडिया--जागो</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03601506380058079689</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_1ch-f93mu3Q/SOugG28CFVI/AAAAAAAAAC4/M2gJrBp_jic/s72-c/ambika.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3049490265168027919.post-1542259466145511150</id><published>2008-10-06T08:19:00.000-07:00</published><updated>2008-10-06T11:28:02.250-07:00</updated><title type='text'>जलियांवाला बाग : दीवारों की सही, किस ने सुध तो ली</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_1ch-f93mu3Q/SOpYpDHDyHI/AAAAAAAAACw/-Le8CiM68kU/s1600-h/1.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://4.bp.blogspot.com/_1ch-f93mu3Q/SOpYpDHDyHI/AAAAAAAAACw/-Le8CiM68kU/s320/1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5254109377513900146" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;अमृतसर के जलियांवाला बाग के विकास के नाम पर विरासत से खिलवाड़ के खिलाफ राज्य भर के कामरेड नेताओं ने 6 अक्तूबर को शक्ति प्रदर्शन किया। 102 वर्ष की उम्र में बाबा भगत सिंह बिलगा ने आवाज बुलंद की, `बाग को सैरगाह (पर्यटन केंद्र) बनाने की बात करने वालों, तब कहां थे जब जनरल डायर फायर कर रहा था।' सेहत खराब होने के बावजूद 80 वर्ष की सीमा पार कर चुके सतपाल डांग और विमला डांग चिलचिलाती धूप में भी जमे रहे। ऐसे और भी बुजुर्ग जोड़े मौजूद थे। सवाल खड़ा है, जिस देश बुजुर्गों की चैन छिन जाए, वहां नौजवानों की आह तक नहीं निकले, ऐसा क्यों ? मंच से यह सवाल प्रदर्शनकारी नेताओं ने भी उठाए। औसतन 50 साल से अधिक की उम्र वाले इन कामरेड नेताओं की मांग शहीद उधम सिंह का बुत लगाने और जिस रास्ते `मृतकों'  को ले जाया गया उन्हें संभालने और केंद्र सरकार की  खोजी कमेटी में कामरेड विद्वानों को शामिल करने जैसी बातों में उलझी दिखी। वह इस शर्म का उल्लेख करना ही `भूल' गए कि आजादी के 61 साल बाद भी शहीदों को स्वतंत्रता सेनानी (फ्रीडम फाइटर) का दर्जा क्यों नहीं मिल पाया है। क्योंकि फिर जवाब देना पड़ना था कि इसमें कामरेडों की भूमिका क्या रही ? सत्ता से फ्रैंडली मैच खेलने के माहिर अधपकी दाढ़ी (50 से 60 वर्ष वाले) कामरेडों ने बाबा बिलगा से इस बारे एसडीएम को मेमोरेंडम सौंपवाया। 1 नवंबर को जालंधर में गदरी बाबयां दे मेले के बाद आंदोलन तेज करने की घोषणा की गई। लेकिन किसके लिए आंदोलन - मरघकट की दीवारों के लिए ? क्या यह शहीदों का अपमान नहीं ? इसे स्वतंत्रता सेनानियों की कुर्बानियों का पवित्र स्थली के रुप में स्वीकार किए जाने पर ही जीवंत किया जा सकता है। ईंटों के लिए रोने वालों को रूहों की परवाह नहीं रही। कहीं से देश प्रेमी की प्रतिध्वनि आती है -&lt;br /&gt;निजात पा नहीं सकोगे मेरे चले जाने के बाद&lt;br /&gt;मकर्द मेरी यादें गुज़श्ता दिलाएगी।&lt;br /&gt;इसके बावजूद दो राय नहीं कि कामरेडों ने जलियांवाला बाग का मुद्दा पकड़ने में बूत परस्त और धर्म निरपेक्ष, दोनों तरह की पार्टियों को पीछे छोड़ दिया है। कहा जा सकता है, चलो जलियांवाला बाग के शहीदों को फ्रीडम फाइटर का दर्जा देने के लिए न सही, वहां की दीवारों की ही किसी ने सुध तो ली। परंतु इसके भरोसे काम नहीं चलेगा। युवाओं में देश प्रेम भरना पड़ेगा। नौजवानों को जगना होगा। इसलिए जरूरी है, जागो इंडिया जागो।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3049490265168027919-1542259466145511150?l=jaago--india--jaago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jaago--india--jaago.blogspot.com/feeds/1542259466145511150/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3049490265168027919&amp;postID=1542259466145511150' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3049490265168027919/posts/default/1542259466145511150'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3049490265168027919/posts/default/1542259466145511150'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jaago--india--jaago.blogspot.com/2008/10/blog-post_06.html' title='जलियांवाला बाग : दीवारों की सही, किस ने सुध तो ली'/><author><name>जागो--इंडिया--जागो</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03601506380058079689</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_1ch-f93mu3Q/SOpYpDHDyHI/AAAAAAAAACw/-Le8CiM68kU/s72-c/1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3049490265168027919.post-495643729188067424</id><published>2008-10-04T04:14:00.000-07:00</published><updated>2008-10-06T00:50:15.811-07:00</updated><title type='text'>किडनी कसाई कौन : डाक्टर या कानून</title><content type='html'>किडनी का जिन्न फिर निकला है। वर्ष 2002 से बार - बार निकल रहा है। इस बार पंजाब के वरिष्ठ पीसीएस अधिकारी किरपाल सिंह की जिंदगी दांव पर है। दूसरी तरफ है अमृतसर निवासी नौजवान सन्नी। घरों में रंग - रोगन कर रोजाना सौ - डेढ़ सौ कमाने वाला। किडनी `दान' करने पर सन्नी के लिए नौकरी, प्लाट और शादी (जर, जोरु और जमीन) की उम्मीदें बंधी थीं। इसी बीच मीडिया ने कर दी गरीब मार ! पूरे मामले का खुलासा कर आपरेशन रुकवा दिया। इन सबके बीच कई बार लगता है, कानून पर सवाल खड़ा करने का हक आम आदमी को नहीं है। कानून को विद्वान सांसद बनाते हैं और कार्यपालिका व न्यायपालिका के बड़े बड़े विद्वान उसे लागू करते हैं। फिर भी 1994 से लागू `किडनी काटो कानून' (ह्यूमन आर्गन ट्रांसप्लांटेशन एक्ट 1994) बार - बार ध्यान खींचता है। 13 साल पुराने इस कानून की विशेषताएं अंदर तक झकझोरती हैं। मानवीयता को रुलाती हैं। इस कानून के तहत अबतक जिन लोगों को सजा हुई है, सभी किडनी देने वाले (डोनर) हैं। किडनी लेने वाले (रेसिपिएंट) या दलालों का यह कानून कभी कुछ नहीं बिगाड़ पाया। कुछ इसी तरह की परिस्थितियों पर इन पक्तियों के शायर का दिल भी रोया होगा ---&lt;br /&gt;बादलों के दरमयां कुछ इस तरह साजिश हुई&lt;br /&gt;मेरा घर मिट्टी का था, मेरे ही घर बारिश हुई&lt;br /&gt;किडनी दान की कानूनी व्यवस्था में पैसों के लेन - देन पर सख्त सजा का प्रावधान है। दूसरी तरफ हर माह 15 से 20 हजार वेतन पाने वाला भी किडनी दान की प्रक्रिया में आपरेशन पर आने वाला डेढ़ - दो लाख का खर्च बिना लोन लिए नहीं झेल सकता। दान तो तभी न कहेंगे, जब किडनी लेने वाले को दाता (डोनर) के आपरेशन पर कोई खर्च नहीं करना पड़े। यानी आपरेशन की अनुमति देने वाली कमेटियों की मुख्य जिम्मेदारी ही यही बनती है कि वह देख ले कि डोनर की आर्थिक स्थिति ठीक है या नहीं। क्योंकि किसकी किडनी किसको लगेगी यह तो विशेषज्ञ डाक्टरों का काम है। किसी जिले का डीसी - एसएसपी इस जन्म में यह तय करने के लिए शायद ही काबिल बन पाए। अब सवाल है कि फिर भी गरीबों की किडनियां क्यों निकलती रही हैं ? उन्हें ही जेल क्यों भेजा जाता रहा है ? अगर किडनी आपरेशन का खर्च कोई और उठा सकता है तो ऐसी व्यवस्था किसकी देन है कि आपरेशन के बाद कम से कम अगले छह महीने तक काम नहीं कर पाने वाले किडनी डोनर को मुआवजे के तौर पर कुछ दिया जाना अपराध हो जाता है। यह कानून सिर्फ किडनी लेने वालों की सुविधा के लिए बना दिखता है जिसमें डोनर के शरीर से किडनी निकालने के बाद उसे दूध से मक्खी की तरह निकाल देने की कठोर व्यवस्था है । डोनर के आपरेशन पर सामने वाला लाखों खर्च करे, तो वह ठीक है। लेकिन डोनर बाद में दवा खाने के लिए हजार रुपये भी ले ले तो गुनाहगार। वाह रे कानून ! वाह रे कानूनविद !! वाह रे कानून बनाने वाले !!! जो डाक्टर लगातार चार - पांच घंटे खड़े रहकर आपरेशन करे, जान बचाए वह कसाई है तो फिर जो कानून गरीब की सेहत छीनने के बाद रोटी के मोहताज बना दे वह .... । उसे क्या कहें ? ऐसा कानून बनाने और उसके जरिए गरीबों को सताने वालों को सजा क्यों नहीं हो ? यह जनता की सरकार है या गरीब मार है। है न गरीब मार ! बदल डालो यह कानून। जागो इंडिया जागो।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3049490265168027919-495643729188067424?l=jaago--india--jaago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jaago--india--jaago.blogspot.com/feeds/495643729188067424/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3049490265168027919&amp;postID=495643729188067424' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3049490265168027919/posts/default/495643729188067424'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3049490265168027919/posts/default/495643729188067424'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jaago--india--jaago.blogspot.com/2008/10/blog-post_04.html' title='किडनी कसाई कौन : डाक्टर या कानून'/><author><name>जागो--इंडिया--जागो</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03601506380058079689</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3049490265168027919.post-4854116490120186651</id><published>2008-10-03T04:52:00.000-07:00</published><updated>2008-10-03T04:53:41.327-07:00</updated><title type='text'>Blood donation camp at Jallianwalla Bagh</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_1ch-f93mu3Q/SOYHumCC3JI/AAAAAAAAACk/FmDGAeJ4-Gg/s1600-h/21.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://1.bp.blogspot.com/_1ch-f93mu3Q/SOYHumCC3JI/AAAAAAAAACk/FmDGAeJ4-Gg/s320/21.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5252894512438762642" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;Amritsar – (October 2) – Today on the occasion of birth anniversaries of Mahatma Gandhi a blood donation camp was organized at Jallianwala Bagh. Different organizations joins their hands under the aegis of `JAGO INDIA JAGO’ movement. Motivation in youth for national pride and homage to Shaheeds of Jallianwala Bagh massacre 13th April 1919 is main target. Getting the status of Freedom fighter for these shaheeds, it was effort in Gandhian mood, `Blood donation in reply of Blood –sahed.’ &lt;br /&gt;Members of the NGO said that blood donation camp was organized to awake the Government from deep slumber to grant the status of freedom fighter to the martyrs who were killed during the massacre of April 13, 1919 when Brigadier General Rengield Dyer did indiscriminate firing on innocent freedom fighters.&lt;br /&gt;There was tremendous response came out during the blood donation camp. Sitting BJP MLA Anil Joshi along with numerous of workers appeared to donate blood. Shaheed –E-Azam Sardar Bhagat Singh youth Front (NGO) led by Gurmit Singh also turned up with dozens of people to donate blood. &lt;br /&gt;Director Principal of Spring Dale School Manveen Sandhu along with her school student and teachers also donated blood. Police personnel, media persons and dozens of tourists also voluntarily offered themselves for blood donation on this occasion. President of Jallianwala Bagh Shaeed Parivar Samiti Bhusan Behal was also present on this occasion. &lt;br /&gt;Director of well known NGO Manveen Sandhu told that she was also paying homage through this blood donation camp to her grand father who was the eye witness of the massacre of Jallianwalla Bagh at the age of 20 when he was a student of Khalsa College Amritsar. Latter on her grand father serve as Dist. And Session Judge in Lahor and retired from Ludhiana.&lt;br /&gt;Doctors from Guru Teg Bhadur Hospital of Government Medical College managed the Blood donation camp on the request of convener D.P. Gupta, Retd. Assistant Commissioner of Municipal Corporation Amritsar and co-convener Naresh Johar. President of Indian Medical Association Dr. Amrik Singh Arora, Medical Supritendent or SGTB hospital Dr. R.P..S Boparai, Satish Bhardwaj, Ganesh Poddar are main amongst organizational support.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3049490265168027919-4854116490120186651?l=jaago--india--jaago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jaago--india--jaago.blogspot.com/feeds/4854116490120186651/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3049490265168027919&amp;postID=4854116490120186651' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3049490265168027919/posts/default/4854116490120186651'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3049490265168027919/posts/default/4854116490120186651'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jaago--india--jaago.blogspot.com/2008/10/blood-donation-camp-at-jallianwalla_03.html' title='Blood donation camp at Jallianwalla Bagh'/><author><name>जागो--इंडिया--जागो</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03601506380058079689</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_1ch-f93mu3Q/SOYHumCC3JI/AAAAAAAAACk/FmDGAeJ4-Gg/s72-c/21.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3049490265168027919.post-3831280433526739324</id><published>2008-09-27T05:55:00.001-07:00</published><updated>2008-10-06T00:16:17.434-07:00</updated><title type='text'>समस्या क्या है - सिर्फ एक लाइन की सूचना</title><content type='html'>देश की सबसे बड़ी समस्या क्या है ? जनसंख्या, भ्रष्टाचार, रोजगार,&lt;br /&gt;अशिक्षा, गरीबी, राजनीति, नौकरशाही, लालफीताशाही या कुछ और ? इन सारे&lt;br /&gt;अपराधों में शामिल लोगों में देश के लिए प्यार कहां है ? क्या मातृ भूमि&lt;br /&gt;(मदर लैंड) के लिए प्यार और कर्तव्य भावना का अभाव देश की सबसे बड़ी&lt;br /&gt;समस्या नहीं है ? अगर ऐसा है, तो कारण  क्या है ? समाधान का रास्ता क्या&lt;br /&gt;है ? पत्रकार और बुद्धिजीवी क्या कर सकते हैं ? - क्या सिर्फ बकचोदी ? या&lt;br /&gt;फिर दलाली करते हुए चैनलों के मालिक बन जाने वाले। तो फिर देखना होगा,&lt;br /&gt;लाला लाजपत राय, गणेश शंकर विद्यार्थी, महात्मा गांधी से लेकर शहीद भगत&lt;br /&gt;सिंह तक की पत्रकार के रूप में भूमिका क्या रही। उस समय के भी बड़े&lt;br /&gt;पत्रकारों की शामें वायसराय और गवर्नरों के साथ गुलजार हुआ करती थीं।&lt;br /&gt;अंग्रेजों की गुलामी पूरी तरह गई नहीं कि सत्ता के दलाल अमेरिकी बाजार&lt;br /&gt;में बिकने की दलाली में जुट गए हैं। इन्हीं चुनौतियों के बीच एक कारण&lt;br /&gt;मिला है। देश के हर गांव - हर शहर में ऐसे ही उदाहरण हैं। उन्हें एक मंच और&lt;br /&gt;आवाज दिए जाने की जरूरत है। एक हथियार मिला है। सिर्फ एक लाइन की सूचना&lt;br /&gt;है - आजादी के 61 और घटना के 90 साल बाद भी जलियांवाला बाग के शहीदों को&lt;br /&gt;फ्रीडम फाइटर नहीं घोषित किया गया है। - इसी में क्रांति का बीज देख रहा&lt;br /&gt;हूं। खुद से सवाल है, मैं कितना जिम्मेदार हूं ? हम (देशवासी) कितने&lt;br /&gt;जिम्मेदार हैं ? मां की इज्जत लुटने से बचाने के लिए शहीद होने वालों की&lt;br /&gt;इज्जत नहीं करने वाले हम लोग क्या हैं ? आओ, ब्लाग को वैचारिक क्रांति के&lt;br /&gt;मंच के रूप में इस्तेमाल करें। सिर्फ मन के गुबार निकालने के मंच के रूप में नहीं। जाति, संप्रदाय, धर्म, दक्षिण (राइटिस्ट),&lt;br /&gt;वाम (लेफिटिस्ट) जैसे वादों से उठकर राष्ट्रवाद का अलख जगाने के प्रयास&lt;br /&gt;में जुट जाएं ताकि प्रतिभाओं को अमेरिका भगाना न पड़े और सत्ता के दलाल&lt;br /&gt;देश को अमेरिका के हाथों में बेच न डालें।  इस माटी से प्यार जग गया तो गुमराह नौजवान भी धमाका-दर-धमाका कर दहशतगर्दी के रास्ते पर भटकते नहीं नजर आएंगे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3049490265168027919-3831280433526739324?l=jaago--india--jaago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jaago--india--jaago.blogspot.com/feeds/3831280433526739324/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3049490265168027919&amp;postID=3831280433526739324' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3049490265168027919/posts/default/3831280433526739324'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3049490265168027919/posts/default/3831280433526739324'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jaago--india--jaago.blogspot.com/2008/09/blog-post_2166.html' title='समस्या क्या है - सिर्फ एक लाइन की सूचना'/><author><name>जागो--इंडिया--जागो</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03601506380058079689</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3049490265168027919.post-199838887917130212</id><published>2008-09-27T05:35:00.000-07:00</published><updated>2008-09-27T05:43:46.319-07:00</updated><title type='text'>कौशल के विचार</title><content type='html'>प्रिय सतीश,&lt;br /&gt;बधाई हो।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;तुम्हारा ब्लाग खुला। देखा। काफी अच्छा लगा। मस्ट हेड शानदार बन पड़ा है। लेख लंबे हो रहे हैं, पर विचार उभर रहा है। सब्जेक्ट को अलग-अलग विभाजित कर लिखने की जरूरत होगी। आइटम पर कमेंट भेजने की प्रक्रिया थोड़ी कठिन जान पड़ती है। इसे ठीक करना होगा। &lt;br /&gt;प्रक्रिया सरल बनानी ही होगी। इसके साथ ही यह भी व्यवस्था करनी होगी कि कमेंट्स आइटम के जस्ट नीचे ओपन हों। इससे कमेंट्स भेजने वाले कविता-कहानी या अपने विचार भी आइटम के जस्ट नीचे देखकर उत्साहित हो सकेंगे। फिलहाल, तुम्हारा प्रयास सराहनीय है। मैं उम्मीद कर रहा था कि इस पर तुम्हारा नाम और फोटो भी देखने को मिलेगा। &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;तुम्हारा ही &lt;br /&gt;कौशल।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3049490265168027919-199838887917130212?l=jaago--india--jaago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jaago--india--jaago.blogspot.com/feeds/199838887917130212/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3049490265168027919&amp;postID=199838887917130212' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3049490265168027919/posts/default/199838887917130212'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3049490265168027919/posts/default/199838887917130212'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jaago--india--jaago.blogspot.com/2008/09/blog-post_27.html' title='कौशल के विचार'/><author><name>जागो--इंडिया--जागो</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03601506380058079689</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3049490265168027919.post-8530122189932556363</id><published>2008-09-25T09:59:00.001-07:00</published><updated>2008-09-25T09:59:28.270-07:00</updated><title type='text'>सिर के बल खड़ी व्यवस्था</title><content type='html'>सिर के बल खड़ी व्यवस्था&lt;br /&gt;कोई भी व्यवस्था बाशिंदों के आम हितों का पोषण और संरक्षण करने के उद्देश्य से ही स्थापित होती है। चाहे वह जंगल का कानून हो या सभ्य मानव समाज का। अगर इन बातों में दम है तो वर्तमान भारतीय व्यवस्था पर भी गौर करना पड़ेगा। सब कुछ सिर के बल नजर आने लगेगा। अपवादों को छोड़ दिया जाए तो टॉप पर वह बैठे हैं, जिन्हें कभी गली के चौराहों पर ही जगह मिलती थी। बचपन में  इलाके और मोहल्ले के बुजुर्ग जिन बच्चों को पढ़ने - लिखने वाला, समझदार, बुद्धिमान, ईमानदार कहते थे, आज सत्ता के बाजार वाली व्यवस्था में उनकी कहीं पूछ नहीं। जिन्होंने मारपीट की, लफंगा घोषित कर दिए गए, कोई नौकरी नहीं मिली, बदली परिस्थितियों में मालिक बन गए। प्रतिभावानों में भी सिर्फ वही टॉप पर पहुंचने के काबिल बन पाए जिन्होंने मक्कारी या चापलूसी में से एक को अपना लिया। दिमाग पहले से तेज था ही, पहले किंगमेकर की भूमिका निभाई और फिर किंग बन गए। सत्ता के शीर्ष पर पहुंच गए। &lt;br /&gt;बातें कुछ अटपटी सी हैं। सीधे समझ भी नहीं आती। लेकिन यही हकीकत है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में अगल बगल झांकने पर सबकुछ साफ हो जाता है। जो नहीं पढ़ सके, नेता बन सरकार चला रहे हैं। दूसरी तरफ डाक्टर और इंजीनियर हैं। यह या तो अमेरिका, यूरोप और जापान भाग रहे हैं या फिर मैनेजर बनने की जुगाड़ में लगे हैं।&lt;br /&gt;तभी तो बाबा आदम के जमाने के दूसरा भगवान कहा जाने वाला डाक्टर और वैद्य अपने बच्चों को इस पेशे में नहीं ला रहा। पुरानी अवधारणा तेजी से बदल रही है। कार्पोरेट कल्चर के साथ नए भगवान उभरे हैं। नाम मिला है मैनेजर और काम मिला है विशेषज्ञों की विशेषज्ञता ( एक्सपर्ट आफ एक्सपर्टीज) का। पिछली सदी के अस्सी व नब्बे के दशक में डाक्टरी और इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद टेक्नोक्रेटों में विदेश भाग जाने या फिर आईएएस \ आईपीएस (भारतीय प्रशासनिक सेवाओं)  बन जाने की होड़ लगी थी। अब उन्हीं इंजीनियरों - डाक्टरों के साथ-साथ आईएएस \ आईपीएस भी एमबीए की डिग्री लेकर कार्पोरेट का हिस्सा बन रहे हैं। यही है काल चक्र। लेकिन सत्य वहीं खड़ा है। सृष्टिकर्ता, पालनकर्ता और संहारकर्ता के हाथों में जीवन में धुरी है। ब्रह्मा, विष्णु और महेश के नए अवतार मैनेजर्स हैं जिनकी पलकों के झपकने से पूरी धरती हिलने लगती है। सामानों की कीमतें बढ़ और घट जाती हैं। गरीबी और भुखमरी पर चर्चा कभी आउट डेटेड विषय हो जाते हैं तो कभी जीवंत। समझने - समझाने की ज्यादा जरूरत नहीं कि लोकतंत्र के नए मालिक कौन हैं। सरकार उसी की बनेगी जिसे भगवान के नव अवतार चाहेंगे। सरकारी सेहत व्यवस्था बिना दवाई और डाक्टर की ओर बढ़ गई है। किसी को भी यह सोचकर भयभीत होने की छूट दी जा सकती है कि वह सोचे कि तब क्या होगा जब डाक्टर सिर्फ कार्पोरेट अस्पतालों में होंगे।&lt;br /&gt;इनमें दो राय नहीं कि काल के चक्र में कर्म की प्रतिष्ठा भी उपर-नीचे घूमती है। सामाजिक ताने-बाने को गणित के आंकड़ों के साथ समझ पाना कभी आसान भी नहीं रहा। भारतीय सामाजिक व्यवस्था में कभी श्रेष्ठ जन माने जाने वाले पंडितों की प्रतिष्ठा कुछ ऐसी ही थी। इन्हीं में से कोई वेदों का ज्ञाता था तो कोई वैद्य था। इनके दर्शन और ज्ञान के भंडार का पूरा समाज सम्मान करता था। संभव है एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक ज्ञान भंडार सिमट जाने के कारण `पंडित ' शब्द की प्रतिष्ठा गिर गई हो। यह बातें ब्रह्मज्ञानी रहे ब्राह्मण परिवारों की `समाजवादी' दृष्टि वाली नई पीढ़ी से भी सुनी जा सकती है। वह भी अपनी जाति पर समाज के अन्य वर्गों व जातियों के साथ अत्याचार करने के आरोप कई-कई उदाहरणों के साथ लगाते हैं। &lt;br /&gt;समाज की चिंता का मुख्य विषय किसी वर्ग विशेष या जाति विशेष के हितों की रक्षा होना या नहीं होना, नहीं हो सकता। प्रतिभाओं का संरक्षक नहीं हो पाना और उनका भटकाव समाज के लिए चुनौतीपूर्ण मुद्दा जरूर होना चाहिए। खूंखार अपराधियों के दिमागी परीक्षण में भी यह खुलासे हुए हैं कि उनकी प्रतिभा का समाज हित में उपयोग काफी लाभदायक सिद्ध हो सकता था। सभ्य समाज में कोई व्यवस्था, चाहे वह लोकतांत्रिक हो या राजशाही, आदर्श उद्देश्य प्रतिभा का सम्मान ही होना चाहिए। वर्तमान दौर कर्म की प्रतिष्ठा परिवर्तन का दौर बना है। कुछ जगहों पर नजर भी आ रहा है कि कार्पोरेट की नई उभरती दुनिया में वही श्रेष्ठ है जिसकी तरफ पैसा पानी की तरह बहता हो। इस कड़ी में यह कहना थोड़ा तल्ख होगा कि जो बिना जबावदेही के प्रतिमाह लाखों से करोड़ों की आमदनी की ओर बढ़ गया, वही सर्वश्रेष्ठ हैं। शेयर बाजार घुलटनिया खा जाए (लुढ़क जाए) तो बड़े खिलाड़ियों का कोई दोष नहीं। वह इतना कमा चुके होते हैं कि विश्व के धनाड्यों में ही शामिल रहेंगे। गुनाह तो उन छोटे निवेशकों, दुकानदारों, कारोबारियों और उद्यमियों का है, जो लालची बन गए। सही कहें तो लालची बना दिया गया। उद्योग - कारोबार बंद कर पैसे शेयर में लगा दिए। अब कर्जदार बन गए हैं।&lt;br /&gt;अब मूल मुद्दे पर चर्चा जरा विस्तार से। दो से ढाई दशक पहले तक दसवीं की परीक्षा पास करने के बाद जिन विद्यार्थियों को मेडिकल (जीव विज्ञान) और नान मेडिकल (गणित) की पढ़ाई का मौका नहीं मिलता था, सामान्यत: वही कामर्स से प्लस टू करते थे। आमतौर पर जो विद्यार्थी ज्यादा कमजोर होते थे, वही आट्रर्स की पढ़ाई करते थे। माता-पिता अपने प्रतिभावान बच्चों को डाक्टर और इंजीनियर ही बनाना चाहते थे। सालों बाद भी मेडिकल कालेजों की संख्या में बहुत इजाफा नहीं हो सका है। सेहत सुविधाओं को हर आदमी तक पहुंचाने के लिए डाक्टरों की संख्या आज भी कम है। इंजीनियरिंग कालेजों की संख्या अपेक्षाकृत तेजी से बढ़ी है। कंप्यूटर और कम्युनिकेशन सहित अन्य नए रास्ते भी विस्तारित हुए हैं। लेकिन वक्त, चाहत और प्राथमिकताएं बदल चुकी हैं। सिर्फ समाज के लिए जीना अब किसी सिद्धांत में नहीं आता। अब तो समाज सेवा भी पेशा है। एनजीओ बनाओ, खूब कमाओ।&lt;br /&gt;बात को दशक पहले तक प्रतिभा के आधार पर पेशे की तरफ केंद्रित किया जाए तो विज्ञान के विद्यार्थियों को समाज में प्रतिभावान माना जाता था। प्लस टू या हायर सेकेंडरी में मेडिकल और नान मेडिकल छात्रों की संख्या लगभग बराबर होती थी। लेकिन डाक्टरी की सीटें कई गुना कम होने के आधार पर कहा जा सकता है कि समाज का सबसे प्रतिभाशाली हिस्सा सरकारी मेडिकल कालेजों से डाक्टर या फिर आईआईटी जैसी प्रतिष्ठा संस्थाओं से इंजीनियर बनकर पेशेवर जीवन की शुरूआत करता था। तीसरे स्थान पर उन प्रतिभाओं को रखा जा सकता है जो उच्च शिक्षा और शोध ( रिसर्च) का लक्षय कर पढ़ाई आगे बढ़ाते और सफलता पाते हैं। प्लस टू के बाद देश व प्रदेश स्तर पर आयोजित होने वाले एनडीए (नैशनल डिफेंस एकेडमी) या घर की स्थिति अच्छी न होने के कारण प्रतियोगिता परीक्षाओं में शामिल हो अन्य सरकारी नौकरियों में चुने जाते थे। इन्हीं के साथ प्रतिभा के चौथे स्थान पर मजबूर पारिवारिक आर्थिक स्थिति वाली प्रतिभाओं को सम्मान दिया जा सकता है जिन्होंने कारोबार को विस्तार दिया। औद्योगिक क्रांति में अहम भूमिका निभाई। इसके बाद राष्ट्रीय व प्रादेशिक प्रशासनिक सेवाओं की बारी आती है। इसमें चयनित होने वाली प्रतिभाओं में ट्रिक्स का खेल काफी दिनों चलता रहा जिसमें संस्कृत, पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन या समाज शास्त्र जैसे विषय लेकर कार्यपालिका की शीर्ष व्यवस्था तैयार होती रही। डाक्टरों और इंजीनियरिंगों को भी इस बात का अहसास हुआ कि उनके हुकमरान प्रतिभा के मामले में किस स्तर पर हैं। देश की श्रेष्ठ मेडिकल व इंजीनियरिंग प्रतिभाओं ने लगातार कई कई सालों तक यूपीएससी ( यूनियन पब्लिक सर्विस कमिशन) की परीक्षाओं में टॉप पोजिशनें हासिल कर इस तथ्य को स्थापित किया तथा कार्यपालिका पर कब्जा करते रहे। अपवादों को छोड़ प्रतिभा  व्यवस्था में सामान्य रूप से छठे स्थान पर वह हैं जिनकी प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी करते-करते उम्र निकलने लगी। लॉ कालेज में दाखिला ले लिया। कानून की पढ़ाई पूरी कर न्यायपालिका के प्रतिनिधि बन गए। इसके आगे कानून के वह माहिर विद्यार्थी रहे जो दिल्ली के चांदनी चौक, लखनऊ के हजरतगंज और पटना के गांधी मैदान के आसपास के चौक चौराहों से फुर्सत नहीं निकाल सके। चाकू गाढ़कर डिग्री हासिल की और नेता बन गए। नजरें जरा गौर से घुमाने की जरूरत है। ऐसी कई हस्तियां उभर कर सामने आ जाती हैं। यह है लोकतांत्रिक भारत के सिरमौर विधायिका के प्रतिनिधि।&lt;br /&gt;यह स्पष्ट करने की जरूरत नहीं कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में विधायिका सर्वश्रेष्ठ है। विधायिका कानून बनाती हैं और न्यायपालिक उसके आधार पर फैसले सुनाती है। कार्यपालिका उसका पालन करती है। जैसे एक बार संसंद से यह कानून पास हो जाए कि विरासत केंद्रों (हेरिटेज सेंटरों) से 100 गज की दूरी के अंदर कोई निमार्ण नहीं कराया जा सकता, तो आर्कोलॉजिक सर्वे आफ इंडिया (एएसआई) उसका पालन करेगी। इससे आगरा में ताजमहल के आसपास के निमार्ण वैध हो गए। भले ही उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती को पिछली बार सत्ता में रहते हुए उक्त अनुमति देने के लिए कानूनी कठघरे में खड़ा किया हो। यही है मैनेजमेंट! लंबी सोच । दूर दष्टि। अब प्राइवेट पार्टियों और प्रोपटी डीलरों के सामने पुलिस क्या कर लेगी? यह काम कोई डाक्टर या इंजीनियरिंग तो कर ही नहीं सकता। यह तो पीपीपी का एक नया फार्मूला है जिसमें एक और पी जुड़ गया है। यह पब्लिक - प्राइवेट पार्टिसिपेशन का उभरता समीकरण है। देश के हर कोने में लोकल स्तर की राजनीति में परिवर्तन है। पार्षद और विधायक बनकर कानून को संचालित करने - कराने में जमीन - जायदीद खरीदने और बेचने का धंधा करने वालों ( प्रोपर्टी डीलरों) की बढ़ती संख्या पर नजर डालने की जरूरत है। कार्पोरेट और माल कल्चर में लोकतंत्र की बदलती तस्वीर सामने आने लगती है। कई बार लोकतंत्र पूंजी का खेल लगने लगता है। समाज का, समाज के लिए और समाज के द्वारा का सिद्धांत कहीं छूट गया है। अब तो कार्पोरेट मैनेजर ही युवा लक्ष्य है। वह कार्पोरेट, जिसके हाथ में किसी देश की सत्ता पर सरकारों को कबिज कराने और हटाने की चाबी है। सुपर पावर अमेरिकी का भी तो यही राज है, जहां सिर्फ कानून - व्यवस्था संभालना ही सरकार का काम बच गया है। बाकी सबकुछ कार्पोरेट जगत के हाथ में है। भारतीय परिदृश्य में नए परिवर्तन भी कुछ ऐसे ही संदेश देने लगे हैं। इस सभी परिवर्तनों के बीच प्रतिभा के पेशागत पलायन से जुड़े प्रतिमानों पर चिंतन करने की जरूरत है। डाक्टर बनकर गरीबों के इलाज की सोचना तथा इंजीनियर बनकर देश की उर्जा समस्या का समाधान नई पीढ़ी की चुनौती नहीं है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3049490265168027919-8530122189932556363?l=jaago--india--jaago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jaago--india--jaago.blogspot.com/feeds/8530122189932556363/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3049490265168027919&amp;postID=8530122189932556363' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3049490265168027919/posts/default/8530122189932556363'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3049490265168027919/posts/default/8530122189932556363'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jaago--india--jaago.blogspot.com/2008/09/blog-post_25.html' title='सिर के बल खड़ी व्यवस्था'/><author><name>जागो--इंडिया--जागो</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03601506380058079689</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3049490265168027919.post-3601503989972230568</id><published>2008-09-23T03:32:00.000-07:00</published><updated>2008-09-23T04:19:14.708-07:00</updated><title type='text'>जागो इंडिया जागो</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_1ch-f93mu3Q/SNjQRxVX6xI/AAAAAAAAACY/9pdoMTFREvY/s1600-h/34.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://1.bp.blogspot.com/_1ch-f93mu3Q/SNjQRxVX6xI/AAAAAAAAACY/9pdoMTFREvY/s320/34.jpg" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5249174369419651858" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;strong&gt;रामायण के विशिष्ट पात्र कुंभकरण को याद करते हुए जागो इंडिया जागो की शुरुआत करते है जलियांवाला बाग में 13 अप्रैल 1919 की घटना इसका आधार है। आजाद भारत की लोकतांत्रिक सरकार आज भी उन्हें स्वतंत्रता सेनानी नहीं मानती। क्या आंखों और दिमाग को विश्वास नहीं हो रहा ? लेकिन यही सच्चाई है। प्रमाण उपलब्ध हैं। लेकिन ऐसा क्यों है ? यही तो सवाल खुद से है। देशवासियों से है। ऐसा क्यों ? अंग्रेजों की गोलियों से भूने गए लोगों को पूरा देश शहीद मानता है। स्वतंत्रता सेनानी (फ्रीडम फाइटर) स्वीकारता है। फिर भी वह सरकारी तौर पर आज तक फ्रीडम फाइटर नहीं है। ऐसा क्यों? इस मुद्दे के जरिए देश की जागृति के लिए है अभियान - जागो इंडिया जागो।&lt;br /&gt;जी हां। हम खुद जगने की कोशिश में है। एक - दूसरे के सहारे जगाए जाने का भरोसा लगाए बैठे हैं। जगने और जगाने का सामूहिक प्रयास शुरु होना उद्देश्य है। महाबली कुंभकरण के बारे में प्रसिद्ध है कि वह छह महीने सोते थे। हम भी पिछले 61 सालों से सोए पड़े हैं। अंग्रेजों से आजादी मिले इतने दिन गुजर चुके हैं। फिर भी जलियांवाला बाग के शहीद सरकारी तौर पर फ्रीडम फाइटर नहीं हैं तो जवाबदेह कौन है? क्या सिर्फ नेता? क्या सिर्फ नौकरशाह? हमारी कोई जवाबदेही नहीं है? शहीदों को अगर सम्मान का दर्जा नहीं मिला है तो हर हिंदुस्तानी जवाबदेह है। यही है विषय जगने और जगाने का। देश इस मुद्दे पर क्यों सो गया? मानो आजादी मिल गई और हम हसीन सपनों में खो गए। यह सबसे खतरनाक है। सोए हुए को जगाया जा सकता है। लेकिन जो जागते हुए सोए, सोने का नाटक करे, महटियाए, उसको जगाना हमेशा नामुमकिन रहा है। है न ! इसलिए लिखा, जगना और जगाना है। अगर सभी मिल जुलकर एक - दूसरे को जगाएंगे तो शायद जग जाएं। समीक्षा कर पाएं कि क्यों पिछले 60 सालों से जागते हुए सो रहा है अपना देश। जलियांवाला बाग तो सिर्फ एक बहाना है। आजादी की लड़ाई में 30 लाख साधु संतो और 10  लाख से अधिक फकीरों ने कुर्बानी दी। स्कूली इतिहास के पन्नों में कहीं इसका उल्लेख नहीं मिलता। नेतागिरी और नौकरशाही के चक्कर में देश का आत्मसम्मान नहीं जगा सके। देश जीवंत नहीं हो सका। इसलिए जरुरी है जगना और जगाना। यह काम कोई एक नहीं कर सकता। किसी एक के बस की बात भी नहीं है। डर है कि कहीं कुंभकरण जैसी नींद के कारण महाबली होते हुए भी देश का अंत न हो जाए। पतन न हो जाए। जाति, धर्म, संप्रदाय, पंथ आदि के नाम पर पूरा देश बंट गया है। हर व्यक्ति बाजार में अकेला खड़ा है। सूई से लेकर पहाड़ तक भ्रष्टाचारियों के कब्जे में है। सबकुछ ठेके पर जा रहा है। रोड, सीवरेज, सेहत, शिक्षा, सबकुछ। हरेक चीज की बोली लग रही है। दलाली हो रही है। अरबों के ठेके में करोड़ों के कमिशनखोरी। सब जायज बनता जा रहा है। बचाव का रास्ता सिर्फ देश के प्रति जागरुक जनता ही तैयार कर सकती है। इसलिए जरूरी है कि जागो और जगाओ। जागो इंडिया जागो।&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3049490265168027919-3601503989972230568?l=jaago--india--jaago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jaago--india--jaago.blogspot.com/feeds/3601503989972230568/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3049490265168027919&amp;postID=3601503989972230568' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3049490265168027919/posts/default/3601503989972230568'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3049490265168027919/posts/default/3601503989972230568'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jaago--india--jaago.blogspot.com/2008/09/blog-post.html' title='जागो इंडिया जागो'/><author><name>जागो--इंडिया--जागो</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03601506380058079689</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_1ch-f93mu3Q/SNjQRxVX6xI/AAAAAAAAACY/9pdoMTFREvY/s72-c/34.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3049490265168027919.post-79881993586449121</id><published>2008-09-22T11:02:00.001-07:00</published><updated>2008-09-22T11:03:11.925-07:00</updated><title type='text'>gurua di nagri</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_1ch-f93mu3Q/SNfd0ckUt8I/AAAAAAAAAB4/NNlK0dDHp20/s1600-h/satish1.JPG"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://3.bp.blogspot.com/_1ch-f93mu3Q/SNfd0ckUt8I/AAAAAAAAAB4/NNlK0dDHp20/s320/satish1.JPG" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5248907783815083970" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3049490265168027919-79881993586449121?l=jaago--india--jaago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jaago--india--jaago.blogspot.com/feeds/79881993586449121/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3049490265168027919&amp;postID=79881993586449121' title='1 Comments'/><link rel='edit' 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